1. गद्य खण्ड
1-गीता
यत्र योगेष्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्र्रुवा नीर्तिमतिर्मम ।।
हे राजन ! जहाँ योगेष्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण् डीव-धनुशधारी अर्जुन हैं , वहीं पर श्री, विजय, विभूति, और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है।
2-‘‘तत्वदर्षन के विशय में
स्वामी विवेकानन्द की वाणी’’
हिन्दू विचारकों को श्रेणी में रखना और तब षुष्क तत्वदर्षन और दुर्बोध पुराण कथाओं और अनोखे चकित करने वाले मनोविज्ञान में से एक धर्मतंत्र तैयार कर देना, जो सुकर हो, सरल हो सर्वप्रिय हो, और साथ में सर्वोच्चमनाओं की आवष्यकताओं का पूरक हो,-एक कठिन कार्य है, जिसको केवल वे लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने केवल उसके लिए प्रयत्न किया है। निर्गुण अद्वैत को दैनिक जीवन में जीवन्त-काव्य-मय-होना चाहिए, तथा घबरा देने वाले योगदान में से अत्यन्त वैज्ञानिक और व्यावहारिक मनोविज्ञान आना चाहिए-और इन सबको एक ऐसे आकार में देना चाहिए कि एक बच्चा भी उसे समझ ले। वह है मेरे जीवन का कार्य।
3-‘‘हिन्दू’’
अपने यहां वेदों को अपौरुषेय माना गया है। ऋग्वेद के दशम मंडल में नारदीय सूक्त के माध्यम से हमें सृष्टा और सृष्टि संबन्धी जो जानकारी मिलती है, वह इस प्रकार है।
‘‘उस समय असत् नहीं था। जो सत् है वह भी नहीं था। और आकाश भी नहीं था। आकाश में विद्यमान साताँभुवन भी नहीं थे। आवरण भी कहां था? किसका कहाँ स्थान था? क्या उस समय दुर्गम और गंभीर जल था? उस समय मृत्यु भी नहीं थी, अमरता भी नहीं थी। वायु षून्य और आत्मावलंबन से ष्वास-प्रष्वास युक्त केवल एक ब्रह्म था। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था। सृष्टि के प्रथम अंधकार (मायारूपी अज्ञान ) से अंधकार (जगत्कारण) ढका हुआ था। सभी अज्ञात और जलमय थे। अविद्यमान वस्तु के द्वारा वह सर्वव्यापी आच्छन्न था। तपस के प्रभाव से वह ‘एक’ (ब्रह्म) उत्पन्न हुआ।
जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप का परिचय ऋग्वेद के ‘‘द्वासुपर्णासयुजा’’ मंत्र में मिलता है। साधना द्वारा आत्मतत्व को पहचानना और उसे फिर परमसत्ता की ओर उन्मुख कर देना, उसी में विलीन हो जाना, वैदिक ऋषियों की यही षिक्षा है। लेकिन आत्मशब्द‘‘स्व’’ के अर्थ में है। किसी अहं की घोशणा नहीं, मरने पर जीव देवयान तथा पित्रृयान मार्ग से दूसरे लोकों में जाता है। इत्यादि के पीछे कर्म ही उद्भाषित होता है। अरण्यकों तक आते-आते ब्रह्म के तीन स्वरूप हो गये।
पृथ्वी आदि के रूप में स्थूल, मनस आदि के रूप में सूक्ष्म व प्रणव के रूप में षुद्ध। ज्ञानियों के लिए ब्रह्म सत् और अज्ञानियों के लिए असत् है। प्रणव स्वरूप ब्रह्म में समस्त जगत लीन हो जाता है। और उसी के स्थावर तथा जंगम रूप में सारा संसार उत्पन्न होता है। यह सत्यज्ञान अनन्त है। परम आकाश में यह अभिव्यक्त होता है और यही मुक्ति का कारक है।
ऋग्वेद में आये ब्रह्म का अर्थ विस्तार हुआ। उसके निर्गुण और सगुण दो बिंब बन गये। निर्गुण ब्रह्म को वेदान्तियों ने र्निविवेश, निरुपाधि, अगम, अगाचर आदि कहकर उस पर वे सभी गुण आरोपित कर दिये जिनसे ईष्वरत्व का भान होता है। यही नहीं उसके नेति-नेति विषेशण का प्रयांेग भी किया जाने लगा। सगुण साधकों ने इस ब्रह्म को सविषेश और सोपाधि कहा। विष्णु औा कृष्ण को सगुण सशरीरी ब्रह्म मानकर पूजना षुरू किया। परिष्कार की प्रकृया में साधकों ने सगुण ब्रह्म को ‘‘अपरब्रह्म’’ औीर निर्गुण ब्रह्म को ‘‘परब्रह्म’’ या कि ‘‘अक्षरब्रह्म’’के सर्वोच्च षिखर पर स्थापित कर दिया।
4-‘‘यहूदी’’
यहूदियों का मानना है कि उनसे अधिक श्रेष्ठ और अंतः सम्पन्न पृथ्वी पर कोई दूसरा नहीं है।
प्रचीन काल में मेसोपोटामियां अर्थात वर्तमान सीरिया तथा इराक में अमीरी, कैनानी, असुरी, आदि कई कबीले रहा करते थे। इन्हीं में से एक का नाम ‘‘हिब्रू’’ था। ये लोग अब्राहम को अपना पितामह मानते थे। इसके पीछे भी एक मिथिक है और यह कि ईष्वर ने गार्डन आॅफ ईडन में खाक से ‘‘आदम’’ को जन्म दिया फिर उसी की एक पसली से ‘‘ईव’’ नाम की एक सुन्दरी की रचना की। गार्डन आॅफ ईडन में ज्ञान का एक वृक्ष था, जिस के फल को खाने की आज्ञा नहीं थी। ‘‘आदम और ईव’’ नग्नावस्था में, अपने शरीर की सुन्दरता से बेखबर रहे थे कि एक दिन ज्ञान के वृक्ष पर लिपटे, जिसके षैतान एवं मेफिस्टोफ्लीज आदि कई नाम हैं, ने आदम और ईव को फल खाने के लिए उकसाया। ज्ञान के वृक्ष का वह फल खाते ही दोनों पर कामदेवता का बुखार चढ़ गया। सृष्टा को जब यह पता चला तो उसने दोनों को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और कहा कि तुुुम पापी हो और पृथ्वी पर जाकर इस पाप का प्रायष्चित करो। तब से लेकर आज तक हर यहूदी मौलिक पाप से पीड़ित है।
अंततः बैबीलोनिया के अब्राहम को ‘‘यहावा’’ अर्थात् ईष्वर ने पवित्रमप्राणी करार दिया। इसी अब्राहम को यहूदी, ईसाई, और इस्लाम को मानने वाले श्रद्व्य मानते हैं। जिस तरह सेनाई पर्वत पर ‘‘मूसा’’ को ईष्वरीय संदेश मिले थे। ई0 पू0(4026में) उसी तरह हजरत मुहम्मद को भी ईष्वरीय संदेश मिला मगर यही कोई सत्ताइस सौ साल बाद।
अस्तु इस तरह के ईष्वर (यहोवा, अल्लाह) आदि की कल्पना अपने यहाँ सभी सभ्यता की देन है यहूदत में अब्राहम ईष्वर (यहोवा ) के कृपा पात्र हैं। ईसाइयत में ईसा ईष्वर की संतान है और इस्लाम में हजरत मुहम्मद ईष्वर के संदेश वाहक ‘‘पैगम्बर’’। सामी या सेमाई आस्था की इन तीनो धाराओं में ईष्वर, लगता कुछ ऐसा है कि वह व्यक्तिवाचक संज्ञा है, जहां उसे छोड़कर किसी और तरफ दृष्टि डालने की आज्ञा नहीं।
यहूदियों का पहला प्रमुख ग्रंथ है ‘‘तोरा’’ जिसका अर्थ होता है षिक्षा, यह सीधे-सीधे ‘‘मौजिज’’ पर नाखिल हुई। यहूदियों के दूसरे ग्रन्थ का नाम है ‘‘तालमुद’’ इसमें मौखिक आचार और दैनिक व्यवहार की बातें हैं। तीसरा ग्रन्थ ‘‘हलाका’’ है। ‘‘तलाका’’ ‘‘तनाका’’ यहूदियों की बाइबल का नाम है। मगर ईसा यहूदत से ठीक उल्टा गये।
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
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