शनिवार, 10 अप्रैल 2010

गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-6)

21-इस पाठ का सारांष
जैसे वीणा का एक तार छेड़ दें। वीणा के तार से ध्वनि पैदा होगी। वह सुनते रहें, सुनते रहें। धीरे-धीरे ध्वनि खोती जायेगी। निध्र्वनि प्रकट होने लगेगी। उसे सुनते रहें ध्वनि क्षीण होने लगेगी। लेकिन जब ध्वनि क्षीण हो रही है, तब जानना कि साथ ही अनुपात में निध्र्वनि प्रखर हो रही है, जब ध्वनि मिट रही है, तब निध्र्वनि जन्म ले रही है। जब ध्वनि खो रही है तक निध्र्वनि का आगमन हो रहा है। फिर थोड़ी देर में ध्वनि खो जायेगी, तब क्या षेष रह जायेगा? अगर कभी ध्वनि का पीछा किया है तो आपको पता चल जायेगा कि ध्वनि-निध्र्वनि में ले जाती है। षब्द निःषब्द में ले जाते हैं। संसार मोक्ष में ला जाता है। संसार ही सार में ले जाता है। षान्ति भी महाषान्ति में ले जाने का सेतु बन जाती है। अर्थात विपरीत का उपयोग करना है।
जीवन ने जो गहराइयाँ छुई हैं और ऊँचाइयों के दर्षन किए हैं जीवन ने जो भी स्वर्ण कलष सत्य के देखे हैं, ऋषि इन आने वाले षब्दों में उनकी घोषणा करेगा। वह परमात्मा से कहता है मेरी रक्षा करना। भूल चूक हो सकती है। षब्द वह कह सकते हैं जो मैं नहीं कहना चाहता था।
सुनने वाले वह सुन सकते हैं जो मैं नहीं कहना चाहता था। मेरी रक्षा करना, क्योंकि कहीं सत्य कहने जाऊँ और असत्य को कहने वाला बन जाऊँ। कहीं सत्य को प्रकट करूँ और असत्य को देने वाला बन जाऊँ। चाहँू कि लोगों को आनन्द बांट दूँ और कहीं ऐसा न हो कि उनके झोले में दुःख पहुँच जाय। मेरी रक्षा करना।
22-निर्वाण उपनिषद-अव्याख्य की व्याख्या
इसमें उसकी चर्चा की गयी है, जिसकी चर्चा कठिन है। उसकी व्याख्या जो अव्याख्य है। बुद्ध से कोई पूछता कि इस जगत को किसने बनाया तो कहते थे-अव्याख्य है। निर्वाण उपनिषद बहुत अद्भुत उपनिषद है।
सूत्र 1-सूफियों के पास एक किताब है। उस किताब का नाम है ‘‘’बुक्स आॅफ बुक्स’ (किताबों की किताब)। उसमें कुछ भी लिखा हुआ नहीं है। खाली है। ‘‘इदरिस षाह’’ जो मुहम्मद के बंषज थे, छोटी सी टिप्पणी लिखने को राजी हो गये। उसके लिए दस-बीस पन्नों की भूमिका लिख दी और दो सौ पन्ने खाली हैं। वह किताब छपी भी कुछ लोग भूल बस खरीद भी लिए क्योंकि भूमिका ही देखकर खरीद लिए, कौन पूरी किताब देखता है। भूमिका में उसने यह समझाने की कोषिष की है किताब खाली क्यों है। इसी तरह ऋषि भी अव्याख्य की व्याख्या करने जा रहा है। क्योंकि खाली किताब को पढ़ना बड़ी कठिन बात है और जो खाली किताब को पढ़ने में समर्थ हो जाता है उसे और किताब पढ़ने की इस दुनियाँ में जरूरत नहीं रह जाती।
सूत्र 2-सत्य सदा से है, हम उसकी व्याख्या करते हैं। हमारी व्याख्या गलत हो सकती है, उससे सत्य गलत नहीं होता। ऋषि पहली घोषणा करता है ‘‘मैं परमहंस हूँ’’ परमहंस सोहम् इतनी हिम्मत वाला ही कह सकता है कि अपनी गहराइयों में मैं परमात्मा हूँ। यह कृष्ण ही अर्जुन से कह सकते हैं ‘‘सर्व धर्मान् परितज्यह मामेकं षरणं ब्रजे’’ सब छोड़ मेरे चरणों में आ। आप जाने या न जाने एक भीतर कोई दीया जलता रहता है। सदा जो बताता रहता है कि कहाँ प्रकाष है और कहाँ अंधकार है। उस दीप का नाम परमहंस है। वह सबके भीतर है।
हम अपने जीवन में इस परमहंस का जरा भी उपयोग नहीं करते। हम कभी सार-असार में फर्क नहीं करते। घीरे-घीरे इम भूल ही जाते हैं कि हमारे भीतर वह बैठा है। जो जहर और अमृत को अलग कर सकता है। जिन्दगी की सारी बुराई, जिन्दगी की सारी भूल का एक मात्र कारण है-हमारे भीतर के परमहंस का सोया होना।
सिद्ध का अर्थ होता है कि वह जो करता है वही सही है और जो नहीं करता है, वही गलत है। यह अंतिम लक्षण है। सार-असार में भी भेद करना छोड़ देता है, वहीं है परमहंस।
सूत्र 3-तीसरे सूत्र में बुद्ध, कृष्ण, महावीर आदि जन कहते हैं, कामदेव को रोकने में वे पहरेदार जैसे होते है। परमहंस के भीतर वासना, कामना तृष्णा प्रवेष नहीं कर सकती।
23-जो जाग्रत हैं, आत्मरत हैं आनन्दमय हैं, परमात्य आश्रित है
हमको अपने पर भी भरोसा नहीं है क्योंकि हम विवेक को ताक पर रख कर जीते हैं। बेहाषी में बिल्कुल जी रहे हैं। क्योंकि हम सदा ही भविष्य का चिंतन करते रहते हैं और अतीत की पुनरुक्ति करते रहते हैं। लेकिन व्यक्ति को जीना चाहिए ‘‘क्षण’’ में अभी और यहीं। मन का बहुत छोटा हिस्सा हमारा जागा हुआ है। एक आदमी एक आदमी नहीं है, बहुत आदमी है। क्रोध आता है सोये हुए हिस्से से और कसम ली जाती है कि अब क्रोध नहीं करेंगे। यह जागे हुए हिस्से से आता है। जब मन टुकडे़-टुकडे़ नहीं रह जाता, इकट्ठा हो जाता है और एक ही व्यक्ति भीतर हो जाता है, तो हाँ का मतलब हाँ और न का मतलब न होने लगता है। उस एक सुर से बँध गयी। चेतना का नाम विवेक है। विवेक से ही जागरण की रक्षा होती है। क्योंकि विवेक जगा हो तो भूल नहीं होती। भीतर विवेक की आग जली हो तो आदमी गलत नहीं चुनता। उसका हर काम जाग्रत में किया हुआ होगा। जानने का सूत्र हमेषा भीतर चलता रहता है, यही रक्षा है। सब गलती अज्ञान है या सब गलती मुर्छा है।
जागे हुए आदमी के साथ जीना हो तो दो ही उपाय हैं या तो वह आपकी माने और सो जाये या आप उसकी माने और जग जाये। आपको ही जागना पडे़गा उसके साथ क्योंकि वह जग चुका है।
सत्संग का यही अर्थ होता है हमेषा अपराध सोये हुए लोगों से होता है। सोया हुआ व्यक्ति पूरी जिन्दगी सिवा दुःख के और क्या अर्जित कर पाता है। बुद्ध यह नहीं कहे कि नीति, नियम, मर्यादा, षास्त्र, गुरू में रक्षा है। उन्होंने कहा विवेक में रक्षा है। होष में रक्षा है। होष के अतिरिक्त कोई रक्षा नहीं हो सकती।
करुणा ही जागे हुए व्यक्ति का खेल है, एक ही रस उनका बाकी रह गया करुणा। करुणा जो भी जान लेता है, तो जानने के साथ ही उसके भीतर वासना तिरोहित हो जाती है और करुणा का जन्म होता है। वासना में जो षक्ति काम आती है वही रूपांतरित होकर करुणा बन जाती है।
हम वासना में ही जीते है। मतलब हम कुछ पाने को जीते हैं और करुणा का अर्थ है हम कुछ देने को जीते हैं। वासना से जो भरे हैं उन्हें हम सम्राट कहते हैं और करुणा से जो भरे हैं उन्हें हम भिक्षु करते हैं। जो दे रहे हैं सिर्फ वे भिखारी हैं, जो ले रहे हैं सिर्फ वे सम्राट हैं।
बुद्ध हमसे दो रोटी मांगते हैं तो हमारे अहंकार को बड़ा रस आता है। लेकिन हमें पता नहीं कि हम एक बहुत हारती हुई वाजी लड़ रहे हैं। बुद्ध दो रोटी लेते हैं, पर वे जो देते हैं, उसका हमें पता भी नहीं चलता, वह है करुणा, जो हमारे दंभ को चूर कर देगा। अर्थात करुणा का अर्थ है देना, वासना का अर्थ है लेना। जीवन बोझ नहीं है, जीवन एक नृत्य है, जागे हुए इंसान के लिए।
विवेकी का आनन्द ही माला है। वे आनन्द की ही माला पहने रहते हैं, उसमें आनन्द के ही गुरिये हैं। वे प्रतिपल ‘‘अहो भाव’’ में जीते हैं। ध्यान रहे-जब तक कारण होता है हमारे सुख का और दुख का, तब तक हमें आनन्द का कोई पता नहीं। क्योंकि ‘‘आनन्द अकारण है’’ अकारण जो अवस्था है, वह भीतर होती है, इसीलिए आनन्द भीतर होता है।
‘‘एकासन गुहायाम्।’’ इसमें दो षब्द समझने हैं गुह्य और एकान्त खोजना है। तो स्वयं के भीतर खोजे बिना नहीं मिलेगा। हम सब आसन जानते हैं, लेकिन ये बाहर की क्रियायें हैं। उपयोगी भी हैं, हितकर हैं, उनसे लाभ भी होता है। लेकिन जो ‘‘परमगति’’ में प्रवेष करते हैं, उनका आसन हो एक है, ‘‘स्वयं ही गुहा में अकेले बचे रहना।’’ वही एक आसन है वही एक काम है। जहाँ मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। द्वन्द या दूसरा समाप्त होते ही तब सिर्फ गुह्य एकान्त रह जाता है, वहाँ न तू होता है न मैं होता है। वहाँ न कोई अपना होता है, न पराया होता है और स्वयं का भी होना नहीं होता। अहंकार भी वहाँ नहीं है। ऐसे गुह्य एकान्त को आसन कहा है।
अकल्पित भिक्षाषी-यह बहुत जरूरी बात है समझने जैसी। योजना करके नहीं, परमात्मा पर छोड़ कर जीना है। अन्य कोई जीने की कल्पना भी नहीं करना चाहे षरीर का ही हो।
‘‘सारांष’’
हंस की क्षमता है एक दूसरी ‘‘काव्य क्षमता’’। वह है कि हंस मोती के अतिरिक्त और कुछ आहार नहीं लेता। मर जाये, पर मोती ही चुनता ह। तो बुद्ध पदार्थ नहीं परमात्मा चुनते हैं। सर्व प्राणियों के भीतर एक रहने वाली आत्मा ही हंस है। इसको ही वे प्रतिपादित करते हैं कि जो सबके भीतर वह ऐसा ही परमहंस है। परमज्ञानी और परम अज्ञानी में वह स्वभाव का नहीं है। वह फर्क केवल ‘‘बोध’’ का है। अवेयरनेसकां यही सिद्ध पुरूष समझाते रहते हैं। व्याख्या किया करते हैं। वह बार-बार याद दिलाते हैं कि वह परमहंस सबके भीतर है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें