शनिवार, 10 अप्रैल 2010

गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-5)

19-पावन दीक्षा प्रभु से जुड़ जाने की
बुद्ध ने जानकर सन्यासियों को स्वामी का नाम नहीं दिया-भिक्षु नाम दिया भिखारी, कुछ भी नहीं है उसके पास। केवल भिक्षा का पात्र है, बस और कुछ भी नहीं। वह जो भिक्षा का पात्र बुद्ध ने सन्यासियों को दिया वह सिर्फ भीख मांगने के लिए ही नहीं था। बुद्ध कहते थे, अपने को भी एक भिक्षा का पात्र ही जानना, उससे ज्यादा नहीं, तभी उस परम सत्य की उपलब्धि हो सकेगी। जीसस कहते थे, जो अपने को बचायेगा, वह मिट जायेगा और जो अपने को मिटा देगा, उसके मिटने का कोई भी उपाय नहीं।
वियोग उपदेष है, उपनिषदों का इतना ही उपदेष है कि इस संसार में जो हम फैला लेते हैं। उससे वियोग, उससे अलग हो जाओ। एक संसार है, जो परमात्मा का फैलाव है और एक संसार है जो मेरा फैलाव है। हमारा फैलाव गिर जाय तो हम परमात्मा के संसार से सम्बन्धित हो जाते हैं। जब तक मेरा अपना फैलाव, तब तक संयोग केसे होगा उससे, जो परमात्मा का है दीक्षा, संतोष और पावन भी है। अलावा सन्यासी के कोई सन्तुष्ट होता ही नहीं। क्यों कि यह कभी ख्याल में भी नहीं आया होगा कि परमात्मा से मिल जाने के अतिरिक्त इस जगत में कोई संतोष नहीं है। यही पावन दीक्षा है प्रभु से जुड़ जाने की।
20-षान्ति पाठ का द्वार विराट सत्य और
प्रभु का आसरा
जिस प्रभु का हमें कोई भी पता नहीं है, उसका स्मरण बड़ी कठिन और असम्भव बात है। और अगर हम जिद करें कि पता होगा तभी स्मरण करेंगे, तो भी बड़ी कठिनाई है क्योंकि पता हो जाने पर स्मरण की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती जो पहचानते हैं उनके लिए प्रार्थना ब्यर्थ है और जिन्हें पता नहीें है वे कैसे प्रार्थना करेंगे? वे कैसे पुकारें उसे? वे कैसे स्मरण करें? जिन्हें उसकी कोई खबर ही नहीं उसकी तरफ वे हाथ भी कैसे जोडें और सिर भी कैसे झुकायें। बूँद को सागर का कोई भी पता नहीं, लेकिन फिर भी बूँद जब तक सागर न हो जाये तब तक वह तृप्त नहीं हो सकती और अँधेरी रात में जलते हुए एक छोटे से दिये को क्या पता होगा कि सूरज के बिना वह नहीं जल सकेगा। उसकी रोषनी भी सूर्य की ही रोषनी है और आपके गांव आपके घर के पास छोटा से जो झरना बहता है, उसे क्या पता होगा कि वह दूर बूँद के सागर से जुड़ा हुआ है और अगर सागर सूख जाये तो यह झरना तत्काल सूखकर समाप्त हो जायेगा। झरने को देखकर आपको भी ख्याल नहीं आता कि सागरों से उसका सम्बन्ध है। आदमी भी ठीक स्थिति में है। वह भी एक छोटा सा चेतना का झरना है। उसमें अगर चेतना प्रकट हो सकी है तो सिर्फ इसलिए कि कहीं चेतना का महासागर भी निकट में है-जुड़ा हुआ, संयुक्त चाहे ज्ञात न हो।
तो साधक जिसकी खोज पर जा रहा है, उसी से प्रार्थना कर रहा है, जिसका पता नहीें है अभी। उसी के चरणों में सिर रख रहा है अभी। यह कैसे संभव हो पायेगा। जिसे भी साधना के जगत् में प्रवेष करना है उसे इस असम्भव को सम्भव बनाना पड़ेगा। जो हम होना चाहते हैं, उसके समक्ष ही हमें प्रणाम करना होगा-हमें, वे जो हम हैं, उसे उसके समक्ष प्रार्थना करनी होगी, जो हम हो सकते हैं।
इस प्रार्थना से परमात्मा को कुछ लाभ हो जाता हो-ऐसा नहीेें हैै। लेकिन इस प्रार्थना से हमारे पैरों में बड़ा बल आ जाता है, क्योंकि यह प्रार्थना प्रभु की नहीं अपने लिए है।
‘‘एक षाष्वत सू़त्र है कि जो चीज जहाँ लीन होती है, वह स्थान वही है जो उद्गम का है। उद्गम और अंत सदा एक हंै। जहाँ से कुछ जन्म पाता है, वहीं समाप्त, वहीं लीन, वहीं विदा हो जाता है। आने का द्वार और जाने का द्वार इस जगत में एक ही है जन्म और मृत्यु उसी द्वार के नाम हैं। बुद्ध कहते थे, ज्योति के इस खो जाने को ही मैं कहता हूँ ‘‘दीए का निर्वाण’’। किसी दिन जब अहंकार भी इसी तरह खो जाता है तब उसे मैं व्यक्ति व्यक्ति निर्वाण कहता हूँ।’’
इस जीवन जो भी महत्वपूर्ण है, उसका स्वाद चाहिए, अर्थ नहीं, उसकी व्याख्या नहीें, उसकी प्रतीति चाहिए। आग क्या है, इतने से काफी नहीें होगा। आग जलानी पड़ेगी। उस आग से गुजरना पड़ेगा और बुझाना पड़ेगा। तब प्रतीति होगी कि ‘‘निर्वाण’’ क्या है। अहंकार को बनाना कठिन है, मिटाना कठिन नहीं है।
परमात्मा से प्रार्थना करनी है तो कुछ और कहना चाहिए। कहना नहीं बल्कि अपने को पहले षांत होना है। अषांत रहते हुए सच्ची प्रार्थना नहीं हो सकती। यह कहना और ठीक होगा कि आप षुद्ध चित्त से यह समझ लें कि आप परमात्मा हैं। या तो फिर आप हैं या परमात्मा हैं। दो नहीं है। क्यों कि जहाँ तक दो हैं वहाँ तक कोई न कोई तल पर फासला कायम रहता है। इसलिए इसे ‘‘षांत पाठ’’ कहा गया।
बुद्ध कहते हैं ‘‘ओम्’’ ओम् प्रतीक है उसका जिसे कहा नहीं जा सकता। ओम् षब्द में कोई भी अर्थ नहीं है। यह मात्र ध्वनि है। क्यों कि अर्थ ही का अर्थ होता है सीमा। ओम् में कोई अर्थ नहीं है। यही उसकी महत्ता है। लेकिन ओम् बहुत ही अर्थपूर्ण है, किसी दूसरे ढ़ंग से। ओम् प्रतीक है उसका, जो नहीं कहा जा सकता। हम सब कुछ कह सकते हैं, सिर्फ परमात्मा को नहीं कह सकते। वह जो अस्तित्व है अन बँटा, एक वही है। यह प्रार्थना अस्तित्व से की जा रही है। इसके लिए मन-वाणी में और वाणी मन में स्थिर हो जाय, ठहर जाय। जब वाणी के लिए जरूरत हो तभी मन को होना चाहिए। पहले तो वाणी को मन में ठहरना पडे़गा। उतना ही रह जाने दें वाणी को जितना मन के, स्वभाव के अनुकूल है। बाकी हट जानें दें। ठीक इसी तरह मन को भी उतना ही रहने दें जितना वाणी को जरूरत हो। तब कहो हे स्वयं प्रकाष आत्मा मेरे सम्मुख तुम प्रकट हो जाओ। लेकिन तभी जब मेरी वाणी षान्त हो जाये और मेरा मन मौन हो जाय। क्यों कि उससे पहले अगर परमात्मा आप के सामने प्रकट हो तो आप पहचान न पाएंगें। ध्यान रहे परमात्मा चैबीस धण्टे आपक ेसामने प्रकट है लेकिन आप पहचान नहीं पाते।
परमात्मा तो प्रकट है, हम ही सब तरफ से बन्द हैं। इसीलिए प्रार्थना है कि हे प्रभु प्रकट हो। वह स्वयं प्रकाष आत्मा तो हमेषा प्रकट है। हमारी आँख ही बन्द है। जहाँ न कुछ पकड़ने को है और न कुछ छोड़ने को है, वही निर्वाण है। एक तो सत्य है बहुत विराट और आदमी बहुत छोटा। तब सत्य उसके ही अनुपात में छोटा जाता है। लेकिन दूसरी दुर्घटना घटती है तक, जब वह सत्य को बोलने जाता है। वह और बड़ी दुर्घटना है। परमात्मा का सत्य तो कितना है पता नहीं, आदमी को जितना सत्य मालूम पड़ता है उतना भी वाणी कह नहीं पाती। वह और सिकुड़ जाता है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं कि मेरी रक्षा करो कि मैं जब सत्य को जानू तो ऐसा न समझ लूँ कि यही पूरा हो गया। जानता रहँू कि षेष है यात्रा जारी रहे, अभी यात्रा बाकी है। सागर में मैं खड़ा हो गया, फिर भी सागर की सीमायें मेरे हाथ की मुट्ठी में नहीं आ गयी। यही मैं जानता रहूँ और जब मैं कहने जाऊँ जब मैं बोलने जाऊँ तब मेरी और भी रक्षा करना। क्योंकि ‘‘सत्य षब्द’’ को जिस तरह विकृत करते हैं, कुछ और विकृत नहीं करते।
कारण है-हमें जो अनुभव हो वह इस समझ पाते हैं, षब्द उसकी सूचना दे पाते हैं। इसीलिए जितना गहरा अनुभव होने लगता है, उतनी ही कठिनाई षब्दों में होने लगती है और सत्य का अनुभव तो अंतिम है। ऋत का अनुभव तो चरम है। उस अनुभव को जब मैं कहने जाऊँ षब्द में तो मेरी रक्षा करना। कौन कहता है कि सत्य कहने जाना? मत जाना। लेकिन एक कठिनाई है। जितना गहरा अनुभव हो, उतनी ही तीव्रता से वह प्रकट होना चाहता है। उसके कारण हैं। सत्य का अनुभव जब होता है तो प्राण हृदय से प्रफुल्लित हो जाते हैं। आनन्द का गुण है, बंटने की इच्छा। आनन्द बंटना चाहता है, जब आप दुख में होते हैं तो सिकुड़ जाते हैं। कमरे में छिप पाये। मर जाये। जब आनन्द में होते हैं तो दौड़ते हैं कि कोई मिल जाय तो उसे बांट दें। महावीर और बुद्ध जब दुख में थे तो जंगल में चले गये। जब आनन्द से भेरे तो गांव में वापस लौट आये। अगर आप अपने पूरे हृदय के आनन्द को बांट दें तो आप तत्काल पायेंगे कि उससे अनन्त गुप्त आनन्द आपके हृदय में फिर भर गया। क्योंकि अनन्त स्रोत के करीब आ गये हो कितना ही उलीचो समाप्त नहीं होगा। ऐसा नहीं कि षब्द में ही बोला जाय निःषब्द में भी कहा जा सकता है। लेकिन निःषब्द में सुनने वाला खोजना बहुत मुष्किल है। इसलिए मजबूरी में षब्द में कहना पड़ता है।

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