बुधवार, 7 अप्रैल 2010

गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-4)


14-मथुरा वृदावन
कहाँ है-पष्चिमी उत्तर प्रदेष में यमुना के किनारे है। सप्तपुरियों में एक माने जाने वाली भगवान श्री कृष्ण की जम्नस्थली मथुरा, मथुरा से 15 किमी0 उत्तर में स्थित है, वृन्दावन।
कब जायं-अगस्त से मार्च के बीच ।
क्यों जायं-ब्रज भूमि के हृदय-स्थल वृन्दावन में जन्माष्टमी पर्व पर जाना अविस्मरणीय स्थिति होगी। जब कृष्ण पक्ष की अष्टमी आती है तो समूचा ब्रज कृष्णमय होकर थिरक उठता है। कृष्ण लीला की झाकियाँ रास और भजन-कीर्तन के साथ सभी का ध्यान इस ओर होता है कि कब रात के 12 बजे और उत्सव षुरू हो। मंगलगान, माखन,-मिश्री की प्रसादी, जयकारों और बधाइयों के साथ बाल गोपाल झूले में विराजते हैं। मथुरा के द्वारिकाधीष और वृन्दावन के बांके बिहारी की छटा तो इतनी नयनाभिराम होती है कि उपस्थित श्रद्धालु सुध विसरा देते हैं।
क्या देखें-मथुरा में श्री द्वारिकाधीष मंन्दिर, श्री कृष्ण जन्म स्थान, विश्राम घाट, पिपलेष्वर मंदिर, सूर्य घाट, धु्रवघाट, रंगभूमि, षिवताल, बलभद्र कुंड, पोतरा कुंड कृष्ण गंगा घाट, कंष किला म्यूजियम आदि। वृन्दावन में, बांके बिहारी मन्दिर रंगजी मंन्दिर, इस्कांन मंदिर, गोबिन्द देव मंन्दिर, षाहजी मंन्दिर, मदन माहेन मंन्दिर, राधाबल्लभ मंन्दिर, कांच मंन्दिर, निधिवन सेवाकुंज आदि।
15-यादों की एक्सरसाइज ऊँ
आप तनाव में है या अकेलापन आप पर हावी हो रहा है तो बस एक हवा दार जगर पर बैठ जायें। अब आँखें बन्द करके खो जायें कुछ मीटी कुछ गुदगुदाती यादों में। यादों की गठरी अकेले खोलें या दोस्तों या परिवारजनों के साथ खोलें। बस इतना याद रखें कि आपकी पसंद सिर्फ अच्छी यादों की हो।
बचपन की, अल्लड़पन की मासूम यादों की हों। इस एक्सरसाइज को मनोवैज्ञानिकों ने भी जरूरी बताया है।
16-और तरीके
1. उन किताबों की धूल झाड़ लें जिनमें बचपन की कोरी कल्पनायें हों, वो किस्से हों जिन्हें सुनकर मीटी नींद आती थी।
2. यादों की गठरी में दबे प्यार, स्नेह और दुलार की मीटी बातों को अपनों में बाँटकर ताजा कर लें।
3. उन गानों, गज़लों और कविताओं को फिर दिमाग पर छाने दें जो कभी फुरसत और रात की तन्हाइयों के साथी बने थे।
4. बच्चों के साथ अपने बचपन की कहानियाँ बाँटें और सुनिये उनकी नये जमाने की ‘‘ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार’’ भले ही आज आपने लाखों करोड़ों कमा लिए हों, पर पहली पगार और संघर्ष की यादें आज भी अच्छी लगंेगी।
17-सगुण-निर्गुण चरम पर जब
निर्गुणोपासक और सगुणापासक दोनों की चित्तवृत्ति चरमावस्था में समान हो जाती है। अन्तर केवल इतना है कि निर्गुणोपासक बहुत श्रम साध्य है और सगुणों पासक अनायास साध्य है। ऐसी स्थिति में सगुणापासक अपने इष्ट सगुण को छोड़कर निर्गुण को किसलिए अपनायें? इसलिए सगुणोपासना के प्रति अपनी अचल आस्था व्यक्त करती हुई गोपियाँ कहती हैं। ‘‘हमारे हरि हारिल की लकड़ी।’’


18-आयार्च भगवान रजनीष के वचन
‘‘यात्रा अमृत की, अक्षय, निःसंषयता, निर्वाण और केवल ज्ञान की’’
बुद्ध को ज्ञान हुआ तो उन्हंें लगा कि जो जाना है, उसे कहूँगा कैसे, इसलिए बुद्ध सात दिन तक चुप्पी साधे रहे। बहुत मीठी कथा है, देवताओं ने बुद्ध के चरणों में सिर रखे और उनसे कहा कि जो तुमने जाना है वह कहो, क्योंकि तुम्हारे जैसा पुरूष हजारों बर्षों में पृथ्वी पर आता है। हजार बर्षों में कभी यह अवसर मिलता है कि अन्धे भी प्रकाष की बात सुन सकें और बहरे भी संगीत से भर जायें, लंगड़े भी चल सकें। मुर्दे भी जीवन की आषा से हरे हो जायें। तूम बोलो। पर बुद्ध ने कहा, जो मैने जाना है, वह बोला नहीं जा सकता और मैं सोचता हूँ कि मैं बोलूँ भी तो जो मुझे समझ पायेंगे, वे बिना मेरे बोले ही समझ जायेंगे और जो मेरे नहीं बोलने पर नहीं समझ रहें हैं, वे वही होंगे जो मेरे बोलने पर भी नहींे समझ पायेंगे इसलिए मेरे चुप रह जाने में क्या हर्ज है? देवता व्यथित हुए और फिर बुद्ध से बोले, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बिलकुल किनारे पर खड़े हैं, अगर आप न बोलें तो वे इसी पार रह जाएं अगर आप बोलें तो वे एक कदम उठाएं और उस पार हो जाएं। समझने और न समझने वालों के बीच एक तीसरा भी है जो आपके बोलने पर समझदार हो जायेगा और पार हो जायेगा।
‘‘अन्ततः बुद्ध को कुछ सूझा नहीं और राजी होना पड़ा-उनके लिए बोलने को जो षायद दोनों के बीच में हो, उनके लिए ही बुद्ध बोले जो दोनों क बीच में हैं’’ तो बुद्ध बेवल सिद्धान्त कहे-मत नहीं, वाद नहीं इज्म नहीं। केवल वही कहा है जो जीवन था परम रहस्य है। वह उनका विचार नहीं अनुभव है। अनुभव और विचार में थोड़ा फर्क है। तो सत्य, विचार से नहीं, अनुभव से समझ में आता है। तो बुद्ध अपना विचार नहीं अपना अनुभव बोले हैं। जिसको बोध हो जाता है वही कहेगा कि अनुभव, अपना जाना हुआ। वह यह नहीं कहेगा मैं मानता हूँ या नहीं मानता हूँ वह कहेगा मैं जानता हूँ।
परिकल्पना का अर्थ होता है, अब तक उपलब्ध विचारों में सर्वाधिक उपयोगी। विज्ञान अपनी परिकल्पना बदलता रहता है। क्यों कि वह सत्य के लिए, ईष्वर के लिए परिकल्पना परिकल्पना करता जा रहे, लेकिन बुद्ध नहीं कहते कि ईष्वर की कल्पना उपयोगी है और यह भी नहीं कहते, ईष्वर है। वे कहते हैं जो है उसका नाम ईष्वर है। ईष्वर अर्थात होना। ईष्वर का मतलब ही होता है (है) और हैं, का मतहब भी होता है (ईष्वर)। बुद्ध का चह अनुभव आकाष जैसी निर्लेप है। इसमें विचार का कोई भी आवरण नहीं है। आकाष नीला दिखाई देता है। लेकिन वास्तव में आकाष नीला नहीं है। नीला दिखाई देने का कारण बीच की हवायें हैं, बीच में हवाओं की परते हैं। दो सौ मील तक सूर्य की किरण हवाओं में प्रवेष करके नीलिमा की भ्रांति पैदा करती है। आकाष में कोई रंग नहीं है। लेकिन हमारी आँख उसको नीला कर देती है। अस्तित्व में भी कोई रंग नहीं है। ईष्वर का सत्य का भी कोई रंग नहीं है। बुद्ध वही देखते हैं जो है। जो अक्षय है। जो अक्षर है। अगर ईष्वर को देखना है तो ज्ञानेन्द्रियों से छुटकारा चाहिए।
हाँ सत्य की खोज अनन्त है। क्यों कि ईष्वर को कभी चुकता नहीं किया जा सकता। हमेषा वह मुट्ठी में नहीं बाहर है। हाँ ऐसा खोजी के सामने ऐसा एक क्षण जरूर आता है कि खोजी कहता है ‘‘ईष्वर ही बचा’’ मैं कहाँ गया। मैं कहाँ हूँ अब? वह जो खोजने निकला था, खो गया है। अब जिसे खोजने निकला था वह हो गया है अब।
बात यह है कि व्यक्ति का और परमात्मा का मिलन कभी नहीं होता। क्यों कि जब तक व्यक्ति होता है तब तक परमात्मा प्रकट नहीं होता है और जब परमात्मा प्रकट होता है तो व्यक्ति खोजने से नहीं मिलता। उसके साथ एक हो गया होता है। इसलिए अनन्त खोज के प्रति चेतना की धारा होती है। अक्षय ओर निर्लेप उसका स्वरूप होता है। जो अक्षय को पा लेता है, वही धनी हैं बाकी सब निर्धन हैं। इसलिए बुद्ध कहते हैं इन्द्रिय जन्य कर्म छोड़ो लेकिन सत्कर्म करो कि यह जो मैंने किया परमात्मा के लिए किया और सब परमात्मा का है। कर्ता तो वही है।
षरीर और पदार्थ का स्वभाव नीचे की तरफ है। चेतना का स्वभाव ऊपर की तरफ है। ऐसा समझ लें कि आदमी एक दीया है, मिट्टी का दीया है। उसमें मिट्टी भी है उसमें एक जलती हुई ज्योति भी है। उसमें तेल भी भरा हुआ है। यह मिट्टी का दीया जमीन की कषिष से चिपका रहता है। वह दीया दृढ़ जाये तो तेल नीचे की तरफ बह जाता है, लेकिन वह ज्योति सदा ऊपर की तरफ भागती रहती है। बुद्ध कहते हैं, जिसने अपने मिट्टी के दीये के साथ तादात्म्य तोड़ दिये, जिसने तेल के साथ संगत छोड़ दिया, जिसने केवल ऊपर भागती हुई ज्योति को ही अपना स्वरूप जाना तो उध्र्वगमन ही उनका पथ है। उनका निर्वाण है। उनका मिट जाना है। ऊपर और ऊपर और ऊपर वे चलते ही चले जाते हैं।

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