5-ब्रह्मांड और ईष्वर के विषय में
वैज्ञानिक विचार धारा
1. भौतिक विचार धारा
ब्रह्मांड की गुत्थियों को लेकर सबसे महत्वपूर्ण षोध 1929 में ‘‘एडविनहबल’’ ने किया। रेड षिफ्ट सिद्धान्त से यह प्रतिपादित किया कि पूरा ब्रह्मांड खिसक रहा है। गैलेक्सियां एक दूसरे से दूर जा रही हैं। इसे रेड षिफ्ट नाम दिया गया।
ईष्वर के अस्तित्व के सवाल ज्यों के त्यों बने रहें। 1946 में जार्ज गेमांग ने हाटविग बैग के जरिये, ईष्वर और ब्रह्मांड की गुत्थियां सुलझाने का एक बड़ा प्रयास किया। इसके अनुसार यह माना गया कि रेड षिफ्ट का कारण एक विस्फोट है। ईष्वर की षक्ति और उसका अस्तित्व भी यहाँ एक सवाल बना ही रहा। 1990-92 ई0 कास्मिक बैकग्राउंड एक्सप्लोरर सैटेलाइट के आंकडे सामने आये। उसके अनुसार ब्रह्मांड एक सक्षम उत्सर्जक की तरह काम करता है। पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक विषेष द्रव्यमान से हुई। जिसका आयतन नहीं था। अब यह विज्ञान के पास कोई जबाब नहीं था कि ऐसा कैसे संभव है। ऐसा होने के पीछे किसी कर्ता या सूत्रधार का होना आवष्यक है। वह कौन हो सकता है, कोई प्राकृतिक कारण या ईष्वर।
6-क्वांटन काँस्मोलाॅजी
मषहूर भौतिक विद् स्टीफनहाकिंग्स ने भी ब्रह्मांड, समय और ईष्वर के अस्तित्व को लेकर महत्वपूर्ण अवधारणा दी है। स्टीफन ने जिस हार्टल के साथ मिलकर एक थ्योरी दी जिसमें समय और काल्पनिक समय की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक विस्फोट से हुई। तो उसमें इतना द्रव्यमान कैसे आया कि विषाल ग्रह-नक्षत्र और सौर मंडल बन गये। इस थ्योरी में समय की अवधारणा को काल्पनिक मानते हुए हाकिंग्स ने ईष्वरीय अस्तित्व को बाइबल के माध्यम से सुलझाने का प्रयास भी किया। बाइबल में लिखा है कि ईष्वर का अस्तित्व ब्रह्मांड से पहले भी था और बाद में भी रहा। लेकिन विज्ञान समय को एक दिषात्मक (वन डारेक्षनल) मानता है। जिसमें या तो वर्तमान होता है या भविष्य। भूतकालीन समय की अवधारणा को विज्ञान नकारता है लेकिन हाकिंग्स ने काल्पनिक संख्याओं के समान काल्पनिक संख्याओं के समान काल्पनिक समय को लेकर बताया कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति समय से सापेक्ष हुई है। अर्थात् एक तरह से किसी सूत्रधार या कर्ता की मौजूदगी में ऐसा हुआ है। ‘‘इसका अर्थ यह हुआ कि इस ब्रह्मांड में कोई ऐसी षक्ति है जो समय से परे है। जिस पर समय का वष नहीं चलता है और वही समय की निर्माता और संहारक भी है। प्रकृति में तो ऐसा कुछ नहीं है तो फिर ईष्वरीय षक्ति ही ऐसा कर सकती है।’’
7-जीव विज्ञान के विचारक
ईष्वरीय तत्व का जीव विज्ञानी प्रमाण दिया है विलियम पैले ने। जीव विज्ञान में जीवों की षारीरिक रचना के आधार पर सजीव और निर्जीव में भेद किया जाता है। एक बीज से विषालकाय वृक्ष और एक कोषिका से असंख्य कोषिकाओं वाले जीवधारियों की उत्पत्ति संयोग वष नहीं हो सकती। पोषण, द्रव्यमान और रूप-गुण के अलावा क्या कारण है कि सम्पूर्ण प्रकृति का एक नियत चक्र है। पैले के समकक्ष वैज्ञानिक डेविडबूम और चाल्र्स डार्विन ने अपने नियमों के आधार पर जीवन की उत्पत्ति में किसी चमत्कार या ईष्वरीय हाथ को झुठला दिया। लेकिन उसके बावजूद आज भी हर जीव विज्ञानी के दार्षनिक दिमाग में जीवन की उत्पत्ति के पीछे आपेरिन माडल का कम ईष्वर षक्ति का ज्यादा विष्वास है।
8-एंथ्रांपिक सिद्धान्त
इस मत के अनुसार ईष्वर क अस्तित्व और जीव उत्पत्ति क बीच एक संबन्ध इस प्रकार बनता है कि अब तक किसी अन्य ग्रह पर जीवन के प्रमाण नहीं मिले है। हांलाकि उनकी दषा और उत्पत्ति के समान हुई है। तो फिर कोई ऐसी षक्ति है जो जीवन की उत्पत्ति और अस्तित्व के लिए जिम्मेदार है। इसे लेकर जगत में विज्ञान के दो एथ्रापिक सिद्धान्त हैं और कहना है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति और ईष्वर के अस्तित्व में संबन्ध की बात एक भ्रम है एक कल्पना है। दूसरा और षक्तिषाली सिद्धान्त मानता है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे एक ‘‘डिजाइनर’’ है और वह ईष्वर के अलावा कोई और नही हो सकता। दोनों में से कौन सा सिद्धान्त सही है, यह जानने के लिए दूनियां भर में कई प्रयोग और निरीक्षण हो रहे हैं। यह भी सच्चाई है कि कई प्रयोगों ने दूसरे सिद्धान्त के पक्ष में आंकडे और निष्कर्ष दिये हैं। जैसे कि ‘‘कांस्मोजाजिकल’’ नियतांक जो कि पिछले दषक की खोज है, कहता है कि इसका मान षून्य के बहुत निकट है। 10120 का एक मात्र भाग। प्रयोग में पाया गया कि यह मान लगभग 10240 का एक भाग आता है। इतना अन्तर तभी हो सकता है जबकि कोई परिवर्तनकारी षक्ति ब्रह्मांड में मौजूद हो। षायद, वह ईष्वर हो या उसी का कोई रूप हो।
सारांष
अन्ततः आज के वैज्ञानिक का तत्व बिजली है और भारतीय दर्षन का तत्व चेतना है। किसी दिन इलेक्ट्रीसिटी भी टूटेगी और बचेगी (कांषसनेसा),
षंकर
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
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