ऊँ श्री गणेशायनम: ऊँ
-दो शब्द-
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम: ।।
सकल ब्रह्मांड एक मधुबन है। मनोरम उपवन है। शांति और अशांति का निकेतन है। जैसा जो है, वैसा है। दो सुमनों में सुगन्धित होने वाला ब्रह्मांड सबसे बड़ा आश्चर्य है। पहला सुमन है-“आ”- अर्थात आध्यात्मिक सुमन और दूसरा सुमन है “भौ” अर्थात माया। यूँ समझें एक ब्रह्म का एक माया का। माया और ब्रह्म एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों अनादि है, एक दूसरे में समाएं हैं। उपर्युक्त दोनों सुमन हमारे लिए दर्पण बन गए। उसी दर्पण में झांक कर मन और आत्मा दोनों विह्वल एवं विभोर हो गए और- “आभौ दर्पण” का उदय मां की कृपा से हो गया।
असल बात है कि हम आपको कैसे समझायें? कैसे बताए? “आभौ दर्पण” पुस्तक का रूप कैसे ले लिया। बस ले लिया। हाँ स्मृति में इतना अवश्य है कि धर्म ग्रन्थों, धर्मशास्त्रों तथा अन्य का पढ़कर,समझकर, जानकर एवं स्वयं के भावों की पुन: पुन: पुनरावृत्ति होकर मेरे लिए मीठी पीड़ा का कारण बन गया। ब्रह्म और माया के वाणों ने मेर ह्रिदय को विदीर्ण कर दिया, मै घायल हो गया। कभी-कभी अश्रुपात भी होता रहा। मेरा ह्रिदय मेरी आत्मा, मेरा मन, मेरा चिंतन, मेरी बुद्धि, पता नही किस रस में डूब गए और आभौ दर्पण के रूप में उतरा गए। इस कृति का प्रयोजन क्या है? मुझे मालूम नहीं। औभौ दर्पण क्या है? इसे जानने के लिए मेरा भी उधर इशारा है, जिधर हमसे पहले को लोगों का रहा है। मै उन्ही के आशीर्वाद का, उन्हीं के अनुभव का, उन्हीं के मार्ग का, उन्हीं के ज्ञान का, आंशिक अनुसरण कर पाया हूं। क्योंकि मेरी झमता ही इतनी है।
इस कृति में आपको चपला की चपलता, पहाड़ की अचलता, सागर की असीमता, आसमान की शून्यता कण-कण की एकता, मानव की मर्मता, बूंद की बृहदता, यौवन की मादकता, प्रकृति की रमणीयता, काम की कामुकता, संत की साधुता, असंत की आकुलता, विद्वान की विद्वता, प्रभु की प्रभुता का अनुभव एवं दर्शन अवश्य होगा जिन रचनाकारों, लेखकों, धर्मगुरुओं, शास्त्रविदों कवियों, शायरों, भक्तों एवं अन्य के द्वारा रचित ग्रंथों के जो अंश आभौ में आए हैं, हम उनका हार्दिक अभिनन्दन एवं हार्दिक आभार प्रकट करते हैं क्योंकि आभौ दर्पण हमारे “आकलन का संकलन” है। हम उपर्युक्त महामानवों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं, क्योंकि आपके ही आशीर्वाद से हम और हमारी लेखनी जीवित है।
पुन: गुरुवर डॉ श्री पाल सिंह झेम साहित्य वाचस्पति को शत्-शत् नमन् करता हूं। यह कृति दो विधाओं में विभक्त है-
1. गद्य खण्ड
2. पद्य खण्ड
शंकर
-दो शब्द-
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम: ।।
सकल ब्रह्मांड एक मधुबन है। मनोरम उपवन है। शांति और अशांति का निकेतन है। जैसा जो है, वैसा है। दो सुमनों में सुगन्धित होने वाला ब्रह्मांड सबसे बड़ा आश्चर्य है। पहला सुमन है-“आ”- अर्थात आध्यात्मिक सुमन और दूसरा सुमन है “भौ” अर्थात माया। यूँ समझें एक ब्रह्म का एक माया का। माया और ब्रह्म एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों अनादि है, एक दूसरे में समाएं हैं। उपर्युक्त दोनों सुमन हमारे लिए दर्पण बन गए। उसी दर्पण में झांक कर मन और आत्मा दोनों विह्वल एवं विभोर हो गए और- “आभौ दर्पण” का उदय मां की कृपा से हो गया।
असल बात है कि हम आपको कैसे समझायें? कैसे बताए? “आभौ दर्पण” पुस्तक का रूप कैसे ले लिया। बस ले लिया। हाँ स्मृति में इतना अवश्य है कि धर्म ग्रन्थों, धर्मशास्त्रों तथा अन्य का पढ़कर,समझकर, जानकर एवं स्वयं के भावों की पुन: पुन: पुनरावृत्ति होकर मेरे लिए मीठी पीड़ा का कारण बन गया। ब्रह्म और माया के वाणों ने मेर ह्रिदय को विदीर्ण कर दिया, मै घायल हो गया। कभी-कभी अश्रुपात भी होता रहा। मेरा ह्रिदय मेरी आत्मा, मेरा मन, मेरा चिंतन, मेरी बुद्धि, पता नही किस रस में डूब गए और आभौ दर्पण के रूप में उतरा गए। इस कृति का प्रयोजन क्या है? मुझे मालूम नहीं। औभौ दर्पण क्या है? इसे जानने के लिए मेरा भी उधर इशारा है, जिधर हमसे पहले को लोगों का रहा है। मै उन्ही के आशीर्वाद का, उन्हीं के अनुभव का, उन्हीं के मार्ग का, उन्हीं के ज्ञान का, आंशिक अनुसरण कर पाया हूं। क्योंकि मेरी झमता ही इतनी है।
इस कृति में आपको चपला की चपलता, पहाड़ की अचलता, सागर की असीमता, आसमान की शून्यता कण-कण की एकता, मानव की मर्मता, बूंद की बृहदता, यौवन की मादकता, प्रकृति की रमणीयता, काम की कामुकता, संत की साधुता, असंत की आकुलता, विद्वान की विद्वता, प्रभु की प्रभुता का अनुभव एवं दर्शन अवश्य होगा जिन रचनाकारों, लेखकों, धर्मगुरुओं, शास्त्रविदों कवियों, शायरों, भक्तों एवं अन्य के द्वारा रचित ग्रंथों के जो अंश आभौ में आए हैं, हम उनका हार्दिक अभिनन्दन एवं हार्दिक आभार प्रकट करते हैं क्योंकि आभौ दर्पण हमारे “आकलन का संकलन” है। हम उपर्युक्त महामानवों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं, क्योंकि आपके ही आशीर्वाद से हम और हमारी लेखनी जीवित है।
पुन: गुरुवर डॉ श्री पाल सिंह झेम साहित्य वाचस्पति को शत्-शत् नमन् करता हूं। यह कृति दो विधाओं में विभक्त है-
1. गद्य खण्ड
2. पद्य खण्ड
शंकर
शारदीय नवरात्र
सन 2006 ई0
सन 2006 ई0
नोट- यह तो आभौ दर्पण की महज एक भूमिका है। आगे आप जरूर पढ़िए Abhaudarpan.blogspot.com पर और भी वह सब कुछ विस्तार से जो कि औभौ दर्पण ने जनसामान्य को इस किताब के जरिए आध्यात्म व भौतिकता के बीच की कड़ी को सुलझाने की कोशिश की है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें