शनिवार, 10 अप्रैल 2010
गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-6)
जैसे वीणा का एक तार छेड़ दें। वीणा के तार से ध्वनि पैदा होगी। वह सुनते रहें, सुनते रहें। धीरे-धीरे ध्वनि खोती जायेगी। निध्र्वनि प्रकट होने लगेगी। उसे सुनते रहें ध्वनि क्षीण होने लगेगी। लेकिन जब ध्वनि क्षीण हो रही है, तब जानना कि साथ ही अनुपात में निध्र्वनि प्रखर हो रही है, जब ध्वनि मिट रही है, तब निध्र्वनि जन्म ले रही है। जब ध्वनि खो रही है तक निध्र्वनि का आगमन हो रहा है। फिर थोड़ी देर में ध्वनि खो जायेगी, तब क्या षेष रह जायेगा? अगर कभी ध्वनि का पीछा किया है तो आपको पता चल जायेगा कि ध्वनि-निध्र्वनि में ले जाती है। षब्द निःषब्द में ले जाते हैं। संसार मोक्ष में ला जाता है। संसार ही सार में ले जाता है। षान्ति भी महाषान्ति में ले जाने का सेतु बन जाती है। अर्थात विपरीत का उपयोग करना है।
जीवन ने जो गहराइयाँ छुई हैं और ऊँचाइयों के दर्षन किए हैं जीवन ने जो भी स्वर्ण कलष सत्य के देखे हैं, ऋषि इन आने वाले षब्दों में उनकी घोषणा करेगा। वह परमात्मा से कहता है मेरी रक्षा करना। भूल चूक हो सकती है। षब्द वह कह सकते हैं जो मैं नहीं कहना चाहता था।
सुनने वाले वह सुन सकते हैं जो मैं नहीं कहना चाहता था। मेरी रक्षा करना, क्योंकि कहीं सत्य कहने जाऊँ और असत्य को कहने वाला बन जाऊँ। कहीं सत्य को प्रकट करूँ और असत्य को देने वाला बन जाऊँ। चाहँू कि लोगों को आनन्द बांट दूँ और कहीं ऐसा न हो कि उनके झोले में दुःख पहुँच जाय। मेरी रक्षा करना।
22-निर्वाण उपनिषद-अव्याख्य की व्याख्या
इसमें उसकी चर्चा की गयी है, जिसकी चर्चा कठिन है। उसकी व्याख्या जो अव्याख्य है। बुद्ध से कोई पूछता कि इस जगत को किसने बनाया तो कहते थे-अव्याख्य है। निर्वाण उपनिषद बहुत अद्भुत उपनिषद है।
सूत्र 1-सूफियों के पास एक किताब है। उस किताब का नाम है ‘‘’बुक्स आॅफ बुक्स’ (किताबों की किताब)। उसमें कुछ भी लिखा हुआ नहीं है। खाली है। ‘‘इदरिस षाह’’ जो मुहम्मद के बंषज थे, छोटी सी टिप्पणी लिखने को राजी हो गये। उसके लिए दस-बीस पन्नों की भूमिका लिख दी और दो सौ पन्ने खाली हैं। वह किताब छपी भी कुछ लोग भूल बस खरीद भी लिए क्योंकि भूमिका ही देखकर खरीद लिए, कौन पूरी किताब देखता है। भूमिका में उसने यह समझाने की कोषिष की है किताब खाली क्यों है। इसी तरह ऋषि भी अव्याख्य की व्याख्या करने जा रहा है। क्योंकि खाली किताब को पढ़ना बड़ी कठिन बात है और जो खाली किताब को पढ़ने में समर्थ हो जाता है उसे और किताब पढ़ने की इस दुनियाँ में जरूरत नहीं रह जाती।
सूत्र 2-सत्य सदा से है, हम उसकी व्याख्या करते हैं। हमारी व्याख्या गलत हो सकती है, उससे सत्य गलत नहीं होता। ऋषि पहली घोषणा करता है ‘‘मैं परमहंस हूँ’’ परमहंस सोहम् इतनी हिम्मत वाला ही कह सकता है कि अपनी गहराइयों में मैं परमात्मा हूँ। यह कृष्ण ही अर्जुन से कह सकते हैं ‘‘सर्व धर्मान् परितज्यह मामेकं षरणं ब्रजे’’ सब छोड़ मेरे चरणों में आ। आप जाने या न जाने एक भीतर कोई दीया जलता रहता है। सदा जो बताता रहता है कि कहाँ प्रकाष है और कहाँ अंधकार है। उस दीप का नाम परमहंस है। वह सबके भीतर है।
हम अपने जीवन में इस परमहंस का जरा भी उपयोग नहीं करते। हम कभी सार-असार में फर्क नहीं करते। घीरे-घीरे इम भूल ही जाते हैं कि हमारे भीतर वह बैठा है। जो जहर और अमृत को अलग कर सकता है। जिन्दगी की सारी बुराई, जिन्दगी की सारी भूल का एक मात्र कारण है-हमारे भीतर के परमहंस का सोया होना।
सिद्ध का अर्थ होता है कि वह जो करता है वही सही है और जो नहीं करता है, वही गलत है। यह अंतिम लक्षण है। सार-असार में भी भेद करना छोड़ देता है, वहीं है परमहंस।
सूत्र 3-तीसरे सूत्र में बुद्ध, कृष्ण, महावीर आदि जन कहते हैं, कामदेव को रोकने में वे पहरेदार जैसे होते है। परमहंस के भीतर वासना, कामना तृष्णा प्रवेष नहीं कर सकती।
23-जो जाग्रत हैं, आत्मरत हैं आनन्दमय हैं, परमात्य आश्रित है
हमको अपने पर भी भरोसा नहीं है क्योंकि हम विवेक को ताक पर रख कर जीते हैं। बेहाषी में बिल्कुल जी रहे हैं। क्योंकि हम सदा ही भविष्य का चिंतन करते रहते हैं और अतीत की पुनरुक्ति करते रहते हैं। लेकिन व्यक्ति को जीना चाहिए ‘‘क्षण’’ में अभी और यहीं। मन का बहुत छोटा हिस्सा हमारा जागा हुआ है। एक आदमी एक आदमी नहीं है, बहुत आदमी है। क्रोध आता है सोये हुए हिस्से से और कसम ली जाती है कि अब क्रोध नहीं करेंगे। यह जागे हुए हिस्से से आता है। जब मन टुकडे़-टुकडे़ नहीं रह जाता, इकट्ठा हो जाता है और एक ही व्यक्ति भीतर हो जाता है, तो हाँ का मतलब हाँ और न का मतलब न होने लगता है। उस एक सुर से बँध गयी। चेतना का नाम विवेक है। विवेक से ही जागरण की रक्षा होती है। क्योंकि विवेक जगा हो तो भूल नहीं होती। भीतर विवेक की आग जली हो तो आदमी गलत नहीं चुनता। उसका हर काम जाग्रत में किया हुआ होगा। जानने का सूत्र हमेषा भीतर चलता रहता है, यही रक्षा है। सब गलती अज्ञान है या सब गलती मुर्छा है।
जागे हुए आदमी के साथ जीना हो तो दो ही उपाय हैं या तो वह आपकी माने और सो जाये या आप उसकी माने और जग जाये। आपको ही जागना पडे़गा उसके साथ क्योंकि वह जग चुका है।
सत्संग का यही अर्थ होता है हमेषा अपराध सोये हुए लोगों से होता है। सोया हुआ व्यक्ति पूरी जिन्दगी सिवा दुःख के और क्या अर्जित कर पाता है। बुद्ध यह नहीं कहे कि नीति, नियम, मर्यादा, षास्त्र, गुरू में रक्षा है। उन्होंने कहा विवेक में रक्षा है। होष में रक्षा है। होष के अतिरिक्त कोई रक्षा नहीं हो सकती।
करुणा ही जागे हुए व्यक्ति का खेल है, एक ही रस उनका बाकी रह गया करुणा। करुणा जो भी जान लेता है, तो जानने के साथ ही उसके भीतर वासना तिरोहित हो जाती है और करुणा का जन्म होता है। वासना में जो षक्ति काम आती है वही रूपांतरित होकर करुणा बन जाती है।
हम वासना में ही जीते है। मतलब हम कुछ पाने को जीते हैं और करुणा का अर्थ है हम कुछ देने को जीते हैं। वासना से जो भरे हैं उन्हें हम सम्राट कहते हैं और करुणा से जो भरे हैं उन्हें हम भिक्षु करते हैं। जो दे रहे हैं सिर्फ वे भिखारी हैं, जो ले रहे हैं सिर्फ वे सम्राट हैं।
बुद्ध हमसे दो रोटी मांगते हैं तो हमारे अहंकार को बड़ा रस आता है। लेकिन हमें पता नहीं कि हम एक बहुत हारती हुई वाजी लड़ रहे हैं। बुद्ध दो रोटी लेते हैं, पर वे जो देते हैं, उसका हमें पता भी नहीं चलता, वह है करुणा, जो हमारे दंभ को चूर कर देगा। अर्थात करुणा का अर्थ है देना, वासना का अर्थ है लेना। जीवन बोझ नहीं है, जीवन एक नृत्य है, जागे हुए इंसान के लिए।
विवेकी का आनन्द ही माला है। वे आनन्द की ही माला पहने रहते हैं, उसमें आनन्द के ही गुरिये हैं। वे प्रतिपल ‘‘अहो भाव’’ में जीते हैं। ध्यान रहे-जब तक कारण होता है हमारे सुख का और दुख का, तब तक हमें आनन्द का कोई पता नहीं। क्योंकि ‘‘आनन्द अकारण है’’ अकारण जो अवस्था है, वह भीतर होती है, इसीलिए आनन्द भीतर होता है।
‘‘एकासन गुहायाम्।’’ इसमें दो षब्द समझने हैं गुह्य और एकान्त खोजना है। तो स्वयं के भीतर खोजे बिना नहीं मिलेगा। हम सब आसन जानते हैं, लेकिन ये बाहर की क्रियायें हैं। उपयोगी भी हैं, हितकर हैं, उनसे लाभ भी होता है। लेकिन जो ‘‘परमगति’’ में प्रवेष करते हैं, उनका आसन हो एक है, ‘‘स्वयं ही गुहा में अकेले बचे रहना।’’ वही एक आसन है वही एक काम है। जहाँ मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। द्वन्द या दूसरा समाप्त होते ही तब सिर्फ गुह्य एकान्त रह जाता है, वहाँ न तू होता है न मैं होता है। वहाँ न कोई अपना होता है, न पराया होता है और स्वयं का भी होना नहीं होता। अहंकार भी वहाँ नहीं है। ऐसे गुह्य एकान्त को आसन कहा है।
अकल्पित भिक्षाषी-यह बहुत जरूरी बात है समझने जैसी। योजना करके नहीं, परमात्मा पर छोड़ कर जीना है। अन्य कोई जीने की कल्पना भी नहीं करना चाहे षरीर का ही हो।
‘‘सारांष’’
हंस की क्षमता है एक दूसरी ‘‘काव्य क्षमता’’। वह है कि हंस मोती के अतिरिक्त और कुछ आहार नहीं लेता। मर जाये, पर मोती ही चुनता ह। तो बुद्ध पदार्थ नहीं परमात्मा चुनते हैं। सर्व प्राणियों के भीतर एक रहने वाली आत्मा ही हंस है। इसको ही वे प्रतिपादित करते हैं कि जो सबके भीतर वह ऐसा ही परमहंस है। परमज्ञानी और परम अज्ञानी में वह स्वभाव का नहीं है। वह फर्क केवल ‘‘बोध’’ का है। अवेयरनेसकां यही सिद्ध पुरूष समझाते रहते हैं। व्याख्या किया करते हैं। वह बार-बार याद दिलाते हैं कि वह परमहंस सबके भीतर है।
गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-5)
बुद्ध ने जानकर सन्यासियों को स्वामी का नाम नहीं दिया-भिक्षु नाम दिया भिखारी, कुछ भी नहीं है उसके पास। केवल भिक्षा का पात्र है, बस और कुछ भी नहीं। वह जो भिक्षा का पात्र बुद्ध ने सन्यासियों को दिया वह सिर्फ भीख मांगने के लिए ही नहीं था। बुद्ध कहते थे, अपने को भी एक भिक्षा का पात्र ही जानना, उससे ज्यादा नहीं, तभी उस परम सत्य की उपलब्धि हो सकेगी। जीसस कहते थे, जो अपने को बचायेगा, वह मिट जायेगा और जो अपने को मिटा देगा, उसके मिटने का कोई भी उपाय नहीं।
वियोग उपदेष है, उपनिषदों का इतना ही उपदेष है कि इस संसार में जो हम फैला लेते हैं। उससे वियोग, उससे अलग हो जाओ। एक संसार है, जो परमात्मा का फैलाव है और एक संसार है जो मेरा फैलाव है। हमारा फैलाव गिर जाय तो हम परमात्मा के संसार से सम्बन्धित हो जाते हैं। जब तक मेरा अपना फैलाव, तब तक संयोग केसे होगा उससे, जो परमात्मा का है दीक्षा, संतोष और पावन भी है। अलावा सन्यासी के कोई सन्तुष्ट होता ही नहीं। क्यों कि यह कभी ख्याल में भी नहीं आया होगा कि परमात्मा से मिल जाने के अतिरिक्त इस जगत में कोई संतोष नहीं है। यही पावन दीक्षा है प्रभु से जुड़ जाने की।
20-षान्ति पाठ का द्वार विराट सत्य और
प्रभु का आसरा
जिस प्रभु का हमें कोई भी पता नहीं है, उसका स्मरण बड़ी कठिन और असम्भव बात है। और अगर हम जिद करें कि पता होगा तभी स्मरण करेंगे, तो भी बड़ी कठिनाई है क्योंकि पता हो जाने पर स्मरण की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती जो पहचानते हैं उनके लिए प्रार्थना ब्यर्थ है और जिन्हें पता नहीें है वे कैसे प्रार्थना करेंगे? वे कैसे पुकारें उसे? वे कैसे स्मरण करें? जिन्हें उसकी कोई खबर ही नहीं उसकी तरफ वे हाथ भी कैसे जोडें और सिर भी कैसे झुकायें। बूँद को सागर का कोई भी पता नहीं, लेकिन फिर भी बूँद जब तक सागर न हो जाये तब तक वह तृप्त नहीं हो सकती और अँधेरी रात में जलते हुए एक छोटे से दिये को क्या पता होगा कि सूरज के बिना वह नहीं जल सकेगा। उसकी रोषनी भी सूर्य की ही रोषनी है और आपके गांव आपके घर के पास छोटा से जो झरना बहता है, उसे क्या पता होगा कि वह दूर बूँद के सागर से जुड़ा हुआ है और अगर सागर सूख जाये तो यह झरना तत्काल सूखकर समाप्त हो जायेगा। झरने को देखकर आपको भी ख्याल नहीं आता कि सागरों से उसका सम्बन्ध है। आदमी भी ठीक स्थिति में है। वह भी एक छोटा सा चेतना का झरना है। उसमें अगर चेतना प्रकट हो सकी है तो सिर्फ इसलिए कि कहीं चेतना का महासागर भी निकट में है-जुड़ा हुआ, संयुक्त चाहे ज्ञात न हो।
तो साधक जिसकी खोज पर जा रहा है, उसी से प्रार्थना कर रहा है, जिसका पता नहीें है अभी। उसी के चरणों में सिर रख रहा है अभी। यह कैसे संभव हो पायेगा। जिसे भी साधना के जगत् में प्रवेष करना है उसे इस असम्भव को सम्भव बनाना पड़ेगा। जो हम होना चाहते हैं, उसके समक्ष ही हमें प्रणाम करना होगा-हमें, वे जो हम हैं, उसे उसके समक्ष प्रार्थना करनी होगी, जो हम हो सकते हैं।
इस प्रार्थना से परमात्मा को कुछ लाभ हो जाता हो-ऐसा नहीेें हैै। लेकिन इस प्रार्थना से हमारे पैरों में बड़ा बल आ जाता है, क्योंकि यह प्रार्थना प्रभु की नहीं अपने लिए है।
‘‘एक षाष्वत सू़त्र है कि जो चीज जहाँ लीन होती है, वह स्थान वही है जो उद्गम का है। उद्गम और अंत सदा एक हंै। जहाँ से कुछ जन्म पाता है, वहीं समाप्त, वहीं लीन, वहीं विदा हो जाता है। आने का द्वार और जाने का द्वार इस जगत में एक ही है जन्म और मृत्यु उसी द्वार के नाम हैं। बुद्ध कहते थे, ज्योति के इस खो जाने को ही मैं कहता हूँ ‘‘दीए का निर्वाण’’। किसी दिन जब अहंकार भी इसी तरह खो जाता है तब उसे मैं व्यक्ति व्यक्ति निर्वाण कहता हूँ।’’
इस जीवन जो भी महत्वपूर्ण है, उसका स्वाद चाहिए, अर्थ नहीं, उसकी व्याख्या नहीें, उसकी प्रतीति चाहिए। आग क्या है, इतने से काफी नहीें होगा। आग जलानी पड़ेगी। उस आग से गुजरना पड़ेगा और बुझाना पड़ेगा। तब प्रतीति होगी कि ‘‘निर्वाण’’ क्या है। अहंकार को बनाना कठिन है, मिटाना कठिन नहीं है।
परमात्मा से प्रार्थना करनी है तो कुछ और कहना चाहिए। कहना नहीं बल्कि अपने को पहले षांत होना है। अषांत रहते हुए सच्ची प्रार्थना नहीं हो सकती। यह कहना और ठीक होगा कि आप षुद्ध चित्त से यह समझ लें कि आप परमात्मा हैं। या तो फिर आप हैं या परमात्मा हैं। दो नहीं है। क्यों कि जहाँ तक दो हैं वहाँ तक कोई न कोई तल पर फासला कायम रहता है। इसलिए इसे ‘‘षांत पाठ’’ कहा गया।
बुद्ध कहते हैं ‘‘ओम्’’ ओम् प्रतीक है उसका जिसे कहा नहीं जा सकता। ओम् षब्द में कोई भी अर्थ नहीं है। यह मात्र ध्वनि है। क्यों कि अर्थ ही का अर्थ होता है सीमा। ओम् में कोई अर्थ नहीं है। यही उसकी महत्ता है। लेकिन ओम् बहुत ही अर्थपूर्ण है, किसी दूसरे ढ़ंग से। ओम् प्रतीक है उसका, जो नहीं कहा जा सकता। हम सब कुछ कह सकते हैं, सिर्फ परमात्मा को नहीं कह सकते। वह जो अस्तित्व है अन बँटा, एक वही है। यह प्रार्थना अस्तित्व से की जा रही है। इसके लिए मन-वाणी में और वाणी मन में स्थिर हो जाय, ठहर जाय। जब वाणी के लिए जरूरत हो तभी मन को होना चाहिए। पहले तो वाणी को मन में ठहरना पडे़गा। उतना ही रह जाने दें वाणी को जितना मन के, स्वभाव के अनुकूल है। बाकी हट जानें दें। ठीक इसी तरह मन को भी उतना ही रहने दें जितना वाणी को जरूरत हो। तब कहो हे स्वयं प्रकाष आत्मा मेरे सम्मुख तुम प्रकट हो जाओ। लेकिन तभी जब मेरी वाणी षान्त हो जाये और मेरा मन मौन हो जाय। क्यों कि उससे पहले अगर परमात्मा आप के सामने प्रकट हो तो आप पहचान न पाएंगें। ध्यान रहे परमात्मा चैबीस धण्टे आपक ेसामने प्रकट है लेकिन आप पहचान नहीं पाते।
परमात्मा तो प्रकट है, हम ही सब तरफ से बन्द हैं। इसीलिए प्रार्थना है कि हे प्रभु प्रकट हो। वह स्वयं प्रकाष आत्मा तो हमेषा प्रकट है। हमारी आँख ही बन्द है। जहाँ न कुछ पकड़ने को है और न कुछ छोड़ने को है, वही निर्वाण है। एक तो सत्य है बहुत विराट और आदमी बहुत छोटा। तब सत्य उसके ही अनुपात में छोटा जाता है। लेकिन दूसरी दुर्घटना घटती है तक, जब वह सत्य को बोलने जाता है। वह और बड़ी दुर्घटना है। परमात्मा का सत्य तो कितना है पता नहीं, आदमी को जितना सत्य मालूम पड़ता है उतना भी वाणी कह नहीं पाती। वह और सिकुड़ जाता है। इसीलिए बुद्ध कहते हैं कि मेरी रक्षा करो कि मैं जब सत्य को जानू तो ऐसा न समझ लूँ कि यही पूरा हो गया। जानता रहँू कि षेष है यात्रा जारी रहे, अभी यात्रा बाकी है। सागर में मैं खड़ा हो गया, फिर भी सागर की सीमायें मेरे हाथ की मुट्ठी में नहीं आ गयी। यही मैं जानता रहूँ और जब मैं कहने जाऊँ जब मैं बोलने जाऊँ तब मेरी और भी रक्षा करना। क्योंकि ‘‘सत्य षब्द’’ को जिस तरह विकृत करते हैं, कुछ और विकृत नहीं करते।
कारण है-हमें जो अनुभव हो वह इस समझ पाते हैं, षब्द उसकी सूचना दे पाते हैं। इसीलिए जितना गहरा अनुभव होने लगता है, उतनी ही कठिनाई षब्दों में होने लगती है और सत्य का अनुभव तो अंतिम है। ऋत का अनुभव तो चरम है। उस अनुभव को जब मैं कहने जाऊँ षब्द में तो मेरी रक्षा करना। कौन कहता है कि सत्य कहने जाना? मत जाना। लेकिन एक कठिनाई है। जितना गहरा अनुभव हो, उतनी ही तीव्रता से वह प्रकट होना चाहता है। उसके कारण हैं। सत्य का अनुभव जब होता है तो प्राण हृदय से प्रफुल्लित हो जाते हैं। आनन्द का गुण है, बंटने की इच्छा। आनन्द बंटना चाहता है, जब आप दुख में होते हैं तो सिकुड़ जाते हैं। कमरे में छिप पाये। मर जाये। जब आनन्द में होते हैं तो दौड़ते हैं कि कोई मिल जाय तो उसे बांट दें। महावीर और बुद्ध जब दुख में थे तो जंगल में चले गये। जब आनन्द से भेरे तो गांव में वापस लौट आये। अगर आप अपने पूरे हृदय के आनन्द को बांट दें तो आप तत्काल पायेंगे कि उससे अनन्त गुप्त आनन्द आपके हृदय में फिर भर गया। क्योंकि अनन्त स्रोत के करीब आ गये हो कितना ही उलीचो समाप्त नहीं होगा। ऐसा नहीं कि षब्द में ही बोला जाय निःषब्द में भी कहा जा सकता है। लेकिन निःषब्द में सुनने वाला खोजना बहुत मुष्किल है। इसलिए मजबूरी में षब्द में कहना पड़ता है।
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-4)
14-मथुरा वृदावन
कहाँ है-पष्चिमी उत्तर प्रदेष में यमुना के किनारे है। सप्तपुरियों में एक माने जाने वाली भगवान श्री कृष्ण की जम्नस्थली मथुरा, मथुरा से 15 किमी0 उत्तर में स्थित है, वृन्दावन।
कब जायं-अगस्त से मार्च के बीच ।
क्यों जायं-ब्रज भूमि के हृदय-स्थल वृन्दावन में जन्माष्टमी पर्व पर जाना अविस्मरणीय स्थिति होगी। जब कृष्ण पक्ष की अष्टमी आती है तो समूचा ब्रज कृष्णमय होकर थिरक उठता है। कृष्ण लीला की झाकियाँ रास और भजन-कीर्तन के साथ सभी का ध्यान इस ओर होता है कि कब रात के 12 बजे और उत्सव षुरू हो। मंगलगान, माखन,-मिश्री की प्रसादी, जयकारों और बधाइयों के साथ बाल गोपाल झूले में विराजते हैं। मथुरा के द्वारिकाधीष और वृन्दावन के बांके बिहारी की छटा तो इतनी नयनाभिराम होती है कि उपस्थित श्रद्धालु सुध विसरा देते हैं।
क्या देखें-मथुरा में श्री द्वारिकाधीष मंन्दिर, श्री कृष्ण जन्म स्थान, विश्राम घाट, पिपलेष्वर मंदिर, सूर्य घाट, धु्रवघाट, रंगभूमि, षिवताल, बलभद्र कुंड, पोतरा कुंड कृष्ण गंगा घाट, कंष किला म्यूजियम आदि। वृन्दावन में, बांके बिहारी मन्दिर रंगजी मंन्दिर, इस्कांन मंदिर, गोबिन्द देव मंन्दिर, षाहजी मंन्दिर, मदन माहेन मंन्दिर, राधाबल्लभ मंन्दिर, कांच मंन्दिर, निधिवन सेवाकुंज आदि।
15-यादों की एक्सरसाइज ऊँ
आप तनाव में है या अकेलापन आप पर हावी हो रहा है तो बस एक हवा दार जगर पर बैठ जायें। अब आँखें बन्द करके खो जायें कुछ मीटी कुछ गुदगुदाती यादों में। यादों की गठरी अकेले खोलें या दोस्तों या परिवारजनों के साथ खोलें। बस इतना याद रखें कि आपकी पसंद सिर्फ अच्छी यादों की हो।
बचपन की, अल्लड़पन की मासूम यादों की हों। इस एक्सरसाइज को मनोवैज्ञानिकों ने भी जरूरी बताया है।
16-और तरीके
1. उन किताबों की धूल झाड़ लें जिनमें बचपन की कोरी कल्पनायें हों, वो किस्से हों जिन्हें सुनकर मीटी नींद आती थी।
2. यादों की गठरी में दबे प्यार, स्नेह और दुलार की मीटी बातों को अपनों में बाँटकर ताजा कर लें।
3. उन गानों, गज़लों और कविताओं को फिर दिमाग पर छाने दें जो कभी फुरसत और रात की तन्हाइयों के साथी बने थे।
4. बच्चों के साथ अपने बचपन की कहानियाँ बाँटें और सुनिये उनकी नये जमाने की ‘‘ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार’’ भले ही आज आपने लाखों करोड़ों कमा लिए हों, पर पहली पगार और संघर्ष की यादें आज भी अच्छी लगंेगी।
17-सगुण-निर्गुण चरम पर जब
निर्गुणोपासक और सगुणापासक दोनों की चित्तवृत्ति चरमावस्था में समान हो जाती है। अन्तर केवल इतना है कि निर्गुणोपासक बहुत श्रम साध्य है और सगुणों पासक अनायास साध्य है। ऐसी स्थिति में सगुणापासक अपने इष्ट सगुण को छोड़कर निर्गुण को किसलिए अपनायें? इसलिए सगुणोपासना के प्रति अपनी अचल आस्था व्यक्त करती हुई गोपियाँ कहती हैं। ‘‘हमारे हरि हारिल की लकड़ी।’’
18-आयार्च भगवान रजनीष के वचन
‘‘यात्रा अमृत की, अक्षय, निःसंषयता, निर्वाण और केवल ज्ञान की’’
बुद्ध को ज्ञान हुआ तो उन्हंें लगा कि जो जाना है, उसे कहूँगा कैसे, इसलिए बुद्ध सात दिन तक चुप्पी साधे रहे। बहुत मीठी कथा है, देवताओं ने बुद्ध के चरणों में सिर रखे और उनसे कहा कि जो तुमने जाना है वह कहो, क्योंकि तुम्हारे जैसा पुरूष हजारों बर्षों में पृथ्वी पर आता है। हजार बर्षों में कभी यह अवसर मिलता है कि अन्धे भी प्रकाष की बात सुन सकें और बहरे भी संगीत से भर जायें, लंगड़े भी चल सकें। मुर्दे भी जीवन की आषा से हरे हो जायें। तूम बोलो। पर बुद्ध ने कहा, जो मैने जाना है, वह बोला नहीं जा सकता और मैं सोचता हूँ कि मैं बोलूँ भी तो जो मुझे समझ पायेंगे, वे बिना मेरे बोले ही समझ जायेंगे और जो मेरे नहीं बोलने पर नहीं समझ रहें हैं, वे वही होंगे जो मेरे बोलने पर भी नहींे समझ पायेंगे इसलिए मेरे चुप रह जाने में क्या हर्ज है? देवता व्यथित हुए और फिर बुद्ध से बोले, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बिलकुल किनारे पर खड़े हैं, अगर आप न बोलें तो वे इसी पार रह जाएं अगर आप बोलें तो वे एक कदम उठाएं और उस पार हो जाएं। समझने और न समझने वालों के बीच एक तीसरा भी है जो आपके बोलने पर समझदार हो जायेगा और पार हो जायेगा।
‘‘अन्ततः बुद्ध को कुछ सूझा नहीं और राजी होना पड़ा-उनके लिए बोलने को जो षायद दोनों के बीच में हो, उनके लिए ही बुद्ध बोले जो दोनों क बीच में हैं’’ तो बुद्ध बेवल सिद्धान्त कहे-मत नहीं, वाद नहीं इज्म नहीं। केवल वही कहा है जो जीवन था परम रहस्य है। वह उनका विचार नहीं अनुभव है। अनुभव और विचार में थोड़ा फर्क है। तो सत्य, विचार से नहीं, अनुभव से समझ में आता है। तो बुद्ध अपना विचार नहीं अपना अनुभव बोले हैं। जिसको बोध हो जाता है वही कहेगा कि अनुभव, अपना जाना हुआ। वह यह नहीं कहेगा मैं मानता हूँ या नहीं मानता हूँ वह कहेगा मैं जानता हूँ।
परिकल्पना का अर्थ होता है, अब तक उपलब्ध विचारों में सर्वाधिक उपयोगी। विज्ञान अपनी परिकल्पना बदलता रहता है। क्यों कि वह सत्य के लिए, ईष्वर के लिए परिकल्पना परिकल्पना करता जा रहे, लेकिन बुद्ध नहीं कहते कि ईष्वर की कल्पना उपयोगी है और यह भी नहीं कहते, ईष्वर है। वे कहते हैं जो है उसका नाम ईष्वर है। ईष्वर अर्थात होना। ईष्वर का मतलब ही होता है (है) और हैं, का मतहब भी होता है (ईष्वर)। बुद्ध का चह अनुभव आकाष जैसी निर्लेप है। इसमें विचार का कोई भी आवरण नहीं है। आकाष नीला दिखाई देता है। लेकिन वास्तव में आकाष नीला नहीं है। नीला दिखाई देने का कारण बीच की हवायें हैं, बीच में हवाओं की परते हैं। दो सौ मील तक सूर्य की किरण हवाओं में प्रवेष करके नीलिमा की भ्रांति पैदा करती है। आकाष में कोई रंग नहीं है। लेकिन हमारी आँख उसको नीला कर देती है। अस्तित्व में भी कोई रंग नहीं है। ईष्वर का सत्य का भी कोई रंग नहीं है। बुद्ध वही देखते हैं जो है। जो अक्षय है। जो अक्षर है। अगर ईष्वर को देखना है तो ज्ञानेन्द्रियों से छुटकारा चाहिए।
हाँ सत्य की खोज अनन्त है। क्यों कि ईष्वर को कभी चुकता नहीं किया जा सकता। हमेषा वह मुट्ठी में नहीं बाहर है। हाँ ऐसा खोजी के सामने ऐसा एक क्षण जरूर आता है कि खोजी कहता है ‘‘ईष्वर ही बचा’’ मैं कहाँ गया। मैं कहाँ हूँ अब? वह जो खोजने निकला था, खो गया है। अब जिसे खोजने निकला था वह हो गया है अब।
बात यह है कि व्यक्ति का और परमात्मा का मिलन कभी नहीं होता। क्यों कि जब तक व्यक्ति होता है तब तक परमात्मा प्रकट नहीं होता है और जब परमात्मा प्रकट होता है तो व्यक्ति खोजने से नहीं मिलता। उसके साथ एक हो गया होता है। इसलिए अनन्त खोज के प्रति चेतना की धारा होती है। अक्षय ओर निर्लेप उसका स्वरूप होता है। जो अक्षय को पा लेता है, वही धनी हैं बाकी सब निर्धन हैं। इसलिए बुद्ध कहते हैं इन्द्रिय जन्य कर्म छोड़ो लेकिन सत्कर्म करो कि यह जो मैंने किया परमात्मा के लिए किया और सब परमात्मा का है। कर्ता तो वही है।
षरीर और पदार्थ का स्वभाव नीचे की तरफ है। चेतना का स्वभाव ऊपर की तरफ है। ऐसा समझ लें कि आदमी एक दीया है, मिट्टी का दीया है। उसमें मिट्टी भी है उसमें एक जलती हुई ज्योति भी है। उसमें तेल भी भरा हुआ है। यह मिट्टी का दीया जमीन की कषिष से चिपका रहता है। वह दीया दृढ़ जाये तो तेल नीचे की तरफ बह जाता है, लेकिन वह ज्योति सदा ऊपर की तरफ भागती रहती है। बुद्ध कहते हैं, जिसने अपने मिट्टी के दीये के साथ तादात्म्य तोड़ दिये, जिसने तेल के साथ संगत छोड़ दिया, जिसने केवल ऊपर भागती हुई ज्योति को ही अपना स्वरूप जाना तो उध्र्वगमन ही उनका पथ है। उनका निर्वाण है। उनका मिट जाना है। ऊपर और ऊपर और ऊपर वे चलते ही चले जाते हैं।
गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-3)
1. निकोलस कोपरनिकस 1473-1343
2. जे0 केप्लर 1571-1630
3. गैलिलियो गैलीलि 1564-1642
4. आइजक न्यूटन 1642-1727
5. राबर्ट बांयल 1791-1867
6. माइकल फैराडे 1791-1867
7. ग्रेगर मेडेल 1822-1884
8. केल्विन थांमसन 1824-1907
9. मैक्सप्लांक 1858-1947
10.अलबर्ट आइन्सटीन 1879-1955
आइन्सटीन ने कहा था बिना विज्ञान के धर्म लंगड़ा है और बिना धर्म के विज्ञान अंधा। वे ईष्वर को विज्ञान की खोजों और आविष्कारों का प्रेरक मानते थे।
10-सच्चा आध्यात्म
आध्यात्म वह है जो सीधा आपके दिल से आता है। आध्यात्म का अर्थ है पारदर्षी होना और स्वयं को गहराई तक महसूस करना। यह भावनाओं का निरंतर विकसित होना भी है। कई बार ऐसा लगता है कि हम स्वयं से प्रतियोगिता करते रहते हैं। यह बेहद अफसोस की बात है। दरअसल खुद से ऊपर उठने की एक कोषिष हमें अध्यात्मिक बनाती है। सभी लोग मूलतः आध्यात्मिक होते हैं। लेकिन आप अपनी प्रतिभा को आध्यात्म में कितना मोड़ते हैं वही चीज आप को औरों से अलग कर देती है। लोग धार्मिकता और धर्म को अलग-अलग मानते हैं। मेरे ख्याल से पूरी दुनियां धार्मिक है। यह धार्मिकता आपकी मूलभूत मानवता में नहीं। मानवीय होना सर्वश्रेष्ठ धार्मिक होना है। सूफी जिस तरह से षान्ति से समृद्ध होते हैं। उसी तरह हम भी समृद्ध हो सकते हैं। आत्मा और परमात्मा दानों की बातें आप से ही षुरू होकर आप पर ही खत्म होती हैं। कलाकार इसे भिन्न तरीके से समझता है। इसीलिए वह समय का सबसे खूबसूरत लम्हा लिख सकता है। क्या यह सच्चा आध्यात्म नहीं है?
मुजफ्फर अली
11-ऐष्वर्य
ऐष्वर्य षब्द ईष्वर से पैदा हुआ है। परमात्मा कुछ और नहीं यह षुद्धतम अवस्था है। आत्मा की। हम अब अपने भीतर भगवत्ता लिए हुए हैं, लेकिन हम में से कभी-कभी कोई भाग्यवान व्यक्ति बाहर की दौड़-धूप छोड़कर अपने भीतर भगवत्ता की अनुभूति कर लेता है। ऐसे व्यक्तियों को हमने भगवान कहा है।
स्वामी चैतन्य कीर्ति
12-ओषो
किसी ने ओषो से पूछा है कि हम परमात्मा की खोज कहाँ से षुरू करें? ओषो कहते हैं - प्रकृति के पास जाओ। तुम पूंछते हो कहाँ से षुरू करें? मैं कहता हूँ। प्रकृति में डूबने लगो एक घंटा तो कम से कम खोज ही लो, जो आदमियों से दूर, एक दूसरी भाषा में, एक दूसरे जगत में तुम्हें ले जाये। जाओ प्रकृति में। पूछो झरनों से। पूछो वृक्षों की हरियाली से। पूछो केतकी, जूही, बेला के फूलों से। पूछो बदलियों से, चाँद तारों से, चले जाओ एकान्त में। प्रकृति परमात्मा का प्रकट रूप है। प्रकृति से जो मिलता है वह सुख है। परमात्मा के प्रकट रूप से जो मिलता है, वह सुख है। और परमात्मा के अप्रकट रूप से जो मिलेगा वह ‘‘महासुख’’ है। प्रकृति से क्षण भर को मिलता है, परमात्मा से ‘‘षाष्वत’’ मिलता है।
‘‘आदमी के साथ यह एक अजीब दुर्घटना घटी है कि आदमी प्रकृति से कट गया है।’’
13-ऊर्जा संतुलित का आहार
हमारे भोजन में छः रस होते हैं। प्रत्येक रस दो तत्वों से बनता है। रस का षाब्दिक अर्थ है स्वाद। आयुर्वेद में छः रस मधुर, अम्ल, क्षार, लवण, तिल व कटु का वर्णन मिलता है।
1. मधुर रस जल व मिट्टी से, यह कफ कारक, लेकिन बात पित्त षकम होता है।
2. अम्लरस अग्नि व जल से बनता है। यह पित्त व कफ कारक, मगर बात षमक होता है।
3. क्षार रस-मिट्टी व जल से बनता है, यह पित्त व कफ कारक, मगर बात षमक होता है।
4. लवण रस-वायु व अग्नि से बनता है, यह बात व पित्त कारक, मगर कफ षमक होता है।
5. तिल रस-मिट्टी व वायु से बनता है, यह बात कारक, मगर पित्त व कफ षमक होता है।
6. कटु रस-वायु व भूमि से बनता है यह बात कारक, मगर पित्त षकम है।
1. मधुर रस-गेहूँ, चावल, जौ मक्का, ज्वार मूंग, मसूर, षहद, चीनी कुछ फल दूध मक्खन, धी से मांस आदि।
2. अम्लरस-टमाटर, नीबू, बंष के फल, खट्टे स्वाद वाले फल, बेर, आलू बोखारा, जामुन, आड़ू, कीजी आदि।
3. लवण रस- विभिन्न प्रकार के लवण।
4. कटु रस-अदरक, लहसन, काली मिर्च तथा अन्य मसाले।
5. तिल रस-करेला, मेथी आदि।
6. क्षार रस-पालक, खजूर, कच्चे फल, अंजीर आदि।
अम्ल रस की अधिकता षरीर में गर्मी पैदा करती है। जिससे चर्म रोग पैदा करते है। लवण रस की अधिकता हाइपरटेंषन व जलावरोध पैदा करती है। मधुर रस की अधिकता लीवर को नुकसान पहँंचाती है व डाइबिटीज पैदा करती है।
‘‘कटु रस’’ की अधिकता सीने में जलन, पेट में अल्सर व हाजमा सम्बन्धी अन्य गड़बडिंयों का कारण बनती है। ‘‘तिल रस’’ की अधिकता ब्लड प्रेषर को कम करती है। इसी प्रकार ‘‘छार रस’’ की अधिकता गले को सुखाती है तथा कब्ज व निद्रा को जन्म देती है।
गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-2)
वैज्ञानिक विचार धारा
1. भौतिक विचार धारा
ब्रह्मांड की गुत्थियों को लेकर सबसे महत्वपूर्ण षोध 1929 में ‘‘एडविनहबल’’ ने किया। रेड षिफ्ट सिद्धान्त से यह प्रतिपादित किया कि पूरा ब्रह्मांड खिसक रहा है। गैलेक्सियां एक दूसरे से दूर जा रही हैं। इसे रेड षिफ्ट नाम दिया गया।
ईष्वर के अस्तित्व के सवाल ज्यों के त्यों बने रहें। 1946 में जार्ज गेमांग ने हाटविग बैग के जरिये, ईष्वर और ब्रह्मांड की गुत्थियां सुलझाने का एक बड़ा प्रयास किया। इसके अनुसार यह माना गया कि रेड षिफ्ट का कारण एक विस्फोट है। ईष्वर की षक्ति और उसका अस्तित्व भी यहाँ एक सवाल बना ही रहा। 1990-92 ई0 कास्मिक बैकग्राउंड एक्सप्लोरर सैटेलाइट के आंकडे सामने आये। उसके अनुसार ब्रह्मांड एक सक्षम उत्सर्जक की तरह काम करता है। पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक विषेष द्रव्यमान से हुई। जिसका आयतन नहीं था। अब यह विज्ञान के पास कोई जबाब नहीं था कि ऐसा कैसे संभव है। ऐसा होने के पीछे किसी कर्ता या सूत्रधार का होना आवष्यक है। वह कौन हो सकता है, कोई प्राकृतिक कारण या ईष्वर।
6-क्वांटन काँस्मोलाॅजी
मषहूर भौतिक विद् स्टीफनहाकिंग्स ने भी ब्रह्मांड, समय और ईष्वर के अस्तित्व को लेकर महत्वपूर्ण अवधारणा दी है। स्टीफन ने जिस हार्टल के साथ मिलकर एक थ्योरी दी जिसमें समय और काल्पनिक समय की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक विस्फोट से हुई। तो उसमें इतना द्रव्यमान कैसे आया कि विषाल ग्रह-नक्षत्र और सौर मंडल बन गये। इस थ्योरी में समय की अवधारणा को काल्पनिक मानते हुए हाकिंग्स ने ईष्वरीय अस्तित्व को बाइबल के माध्यम से सुलझाने का प्रयास भी किया। बाइबल में लिखा है कि ईष्वर का अस्तित्व ब्रह्मांड से पहले भी था और बाद में भी रहा। लेकिन विज्ञान समय को एक दिषात्मक (वन डारेक्षनल) मानता है। जिसमें या तो वर्तमान होता है या भविष्य। भूतकालीन समय की अवधारणा को विज्ञान नकारता है लेकिन हाकिंग्स ने काल्पनिक संख्याओं के समान काल्पनिक संख्याओं के समान काल्पनिक समय को लेकर बताया कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति समय से सापेक्ष हुई है। अर्थात् एक तरह से किसी सूत्रधार या कर्ता की मौजूदगी में ऐसा हुआ है। ‘‘इसका अर्थ यह हुआ कि इस ब्रह्मांड में कोई ऐसी षक्ति है जो समय से परे है। जिस पर समय का वष नहीं चलता है और वही समय की निर्माता और संहारक भी है। प्रकृति में तो ऐसा कुछ नहीं है तो फिर ईष्वरीय षक्ति ही ऐसा कर सकती है।’’
7-जीव विज्ञान के विचारक
ईष्वरीय तत्व का जीव विज्ञानी प्रमाण दिया है विलियम पैले ने। जीव विज्ञान में जीवों की षारीरिक रचना के आधार पर सजीव और निर्जीव में भेद किया जाता है। एक बीज से विषालकाय वृक्ष और एक कोषिका से असंख्य कोषिकाओं वाले जीवधारियों की उत्पत्ति संयोग वष नहीं हो सकती। पोषण, द्रव्यमान और रूप-गुण के अलावा क्या कारण है कि सम्पूर्ण प्रकृति का एक नियत चक्र है। पैले के समकक्ष वैज्ञानिक डेविडबूम और चाल्र्स डार्विन ने अपने नियमों के आधार पर जीवन की उत्पत्ति में किसी चमत्कार या ईष्वरीय हाथ को झुठला दिया। लेकिन उसके बावजूद आज भी हर जीव विज्ञानी के दार्षनिक दिमाग में जीवन की उत्पत्ति के पीछे आपेरिन माडल का कम ईष्वर षक्ति का ज्यादा विष्वास है।
8-एंथ्रांपिक सिद्धान्त
इस मत के अनुसार ईष्वर क अस्तित्व और जीव उत्पत्ति क बीच एक संबन्ध इस प्रकार बनता है कि अब तक किसी अन्य ग्रह पर जीवन के प्रमाण नहीं मिले है। हांलाकि उनकी दषा और उत्पत्ति के समान हुई है। तो फिर कोई ऐसी षक्ति है जो जीवन की उत्पत्ति और अस्तित्व के लिए जिम्मेदार है। इसे लेकर जगत में विज्ञान के दो एथ्रापिक सिद्धान्त हैं और कहना है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति और ईष्वर के अस्तित्व में संबन्ध की बात एक भ्रम है एक कल्पना है। दूसरा और षक्तिषाली सिद्धान्त मानता है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे एक ‘‘डिजाइनर’’ है और वह ईष्वर के अलावा कोई और नही हो सकता। दोनों में से कौन सा सिद्धान्त सही है, यह जानने के लिए दूनियां भर में कई प्रयोग और निरीक्षण हो रहे हैं। यह भी सच्चाई है कि कई प्रयोगों ने दूसरे सिद्धान्त के पक्ष में आंकडे और निष्कर्ष दिये हैं। जैसे कि ‘‘कांस्मोजाजिकल’’ नियतांक जो कि पिछले दषक की खोज है, कहता है कि इसका मान षून्य के बहुत निकट है। 10120 का एक मात्र भाग। प्रयोग में पाया गया कि यह मान लगभग 10240 का एक भाग आता है। इतना अन्तर तभी हो सकता है जबकि कोई परिवर्तनकारी षक्ति ब्रह्मांड में मौजूद हो। षायद, वह ईष्वर हो या उसी का कोई रूप हो।
सारांष
अन्ततः आज के वैज्ञानिक का तत्व बिजली है और भारतीय दर्षन का तत्व चेतना है। किसी दिन इलेक्ट्रीसिटी भी टूटेगी और बचेगी (कांषसनेसा),
षंकर
गद्य खंड में क्या है खास (पार्ट-1)
1-गीता
यत्र योगेष्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्र्रुवा नीर्तिमतिर्मम ।।
हे राजन ! जहाँ योगेष्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण् डीव-धनुशधारी अर्जुन हैं , वहीं पर श्री, विजय, विभूति, और अचल नीति है- ऐसा मेरा मत है।
2-‘‘तत्वदर्षन के विशय में
स्वामी विवेकानन्द की वाणी’’
हिन्दू विचारकों को श्रेणी में रखना और तब षुष्क तत्वदर्षन और दुर्बोध पुराण कथाओं और अनोखे चकित करने वाले मनोविज्ञान में से एक धर्मतंत्र तैयार कर देना, जो सुकर हो, सरल हो सर्वप्रिय हो, और साथ में सर्वोच्चमनाओं की आवष्यकताओं का पूरक हो,-एक कठिन कार्य है, जिसको केवल वे लोग समझ सकते हैं, जिन्होंने केवल उसके लिए प्रयत्न किया है। निर्गुण अद्वैत को दैनिक जीवन में जीवन्त-काव्य-मय-होना चाहिए, तथा घबरा देने वाले योगदान में से अत्यन्त वैज्ञानिक और व्यावहारिक मनोविज्ञान आना चाहिए-और इन सबको एक ऐसे आकार में देना चाहिए कि एक बच्चा भी उसे समझ ले। वह है मेरे जीवन का कार्य।
3-‘‘हिन्दू’’
अपने यहां वेदों को अपौरुषेय माना गया है। ऋग्वेद के दशम मंडल में नारदीय सूक्त के माध्यम से हमें सृष्टा और सृष्टि संबन्धी जो जानकारी मिलती है, वह इस प्रकार है।
‘‘उस समय असत् नहीं था। जो सत् है वह भी नहीं था। और आकाश भी नहीं था। आकाश में विद्यमान साताँभुवन भी नहीं थे। आवरण भी कहां था? किसका कहाँ स्थान था? क्या उस समय दुर्गम और गंभीर जल था? उस समय मृत्यु भी नहीं थी, अमरता भी नहीं थी। वायु षून्य और आत्मावलंबन से ष्वास-प्रष्वास युक्त केवल एक ब्रह्म था। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था। सृष्टि के प्रथम अंधकार (मायारूपी अज्ञान ) से अंधकार (जगत्कारण) ढका हुआ था। सभी अज्ञात और जलमय थे। अविद्यमान वस्तु के द्वारा वह सर्वव्यापी आच्छन्न था। तपस के प्रभाव से वह ‘एक’ (ब्रह्म) उत्पन्न हुआ।
जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप का परिचय ऋग्वेद के ‘‘द्वासुपर्णासयुजा’’ मंत्र में मिलता है। साधना द्वारा आत्मतत्व को पहचानना और उसे फिर परमसत्ता की ओर उन्मुख कर देना, उसी में विलीन हो जाना, वैदिक ऋषियों की यही षिक्षा है। लेकिन आत्मशब्द‘‘स्व’’ के अर्थ में है। किसी अहं की घोशणा नहीं, मरने पर जीव देवयान तथा पित्रृयान मार्ग से दूसरे लोकों में जाता है। इत्यादि के पीछे कर्म ही उद्भाषित होता है। अरण्यकों तक आते-आते ब्रह्म के तीन स्वरूप हो गये।
पृथ्वी आदि के रूप में स्थूल, मनस आदि के रूप में सूक्ष्म व प्रणव के रूप में षुद्ध। ज्ञानियों के लिए ब्रह्म सत् और अज्ञानियों के लिए असत् है। प्रणव स्वरूप ब्रह्म में समस्त जगत लीन हो जाता है। और उसी के स्थावर तथा जंगम रूप में सारा संसार उत्पन्न होता है। यह सत्यज्ञान अनन्त है। परम आकाश में यह अभिव्यक्त होता है और यही मुक्ति का कारक है।
ऋग्वेद में आये ब्रह्म का अर्थ विस्तार हुआ। उसके निर्गुण और सगुण दो बिंब बन गये। निर्गुण ब्रह्म को वेदान्तियों ने र्निविवेश, निरुपाधि, अगम, अगाचर आदि कहकर उस पर वे सभी गुण आरोपित कर दिये जिनसे ईष्वरत्व का भान होता है। यही नहीं उसके नेति-नेति विषेशण का प्रयांेग भी किया जाने लगा। सगुण साधकों ने इस ब्रह्म को सविषेश और सोपाधि कहा। विष्णु औा कृष्ण को सगुण सशरीरी ब्रह्म मानकर पूजना षुरू किया। परिष्कार की प्रकृया में साधकों ने सगुण ब्रह्म को ‘‘अपरब्रह्म’’ औीर निर्गुण ब्रह्म को ‘‘परब्रह्म’’ या कि ‘‘अक्षरब्रह्म’’के सर्वोच्च षिखर पर स्थापित कर दिया।
4-‘‘यहूदी’’
यहूदियों का मानना है कि उनसे अधिक श्रेष्ठ और अंतः सम्पन्न पृथ्वी पर कोई दूसरा नहीं है।
प्रचीन काल में मेसोपोटामियां अर्थात वर्तमान सीरिया तथा इराक में अमीरी, कैनानी, असुरी, आदि कई कबीले रहा करते थे। इन्हीं में से एक का नाम ‘‘हिब्रू’’ था। ये लोग अब्राहम को अपना पितामह मानते थे। इसके पीछे भी एक मिथिक है और यह कि ईष्वर ने गार्डन आॅफ ईडन में खाक से ‘‘आदम’’ को जन्म दिया फिर उसी की एक पसली से ‘‘ईव’’ नाम की एक सुन्दरी की रचना की। गार्डन आॅफ ईडन में ज्ञान का एक वृक्ष था, जिस के फल को खाने की आज्ञा नहीं थी। ‘‘आदम और ईव’’ नग्नावस्था में, अपने शरीर की सुन्दरता से बेखबर रहे थे कि एक दिन ज्ञान के वृक्ष पर लिपटे, जिसके षैतान एवं मेफिस्टोफ्लीज आदि कई नाम हैं, ने आदम और ईव को फल खाने के लिए उकसाया। ज्ञान के वृक्ष का वह फल खाते ही दोनों पर कामदेवता का बुखार चढ़ गया। सृष्टा को जब यह पता चला तो उसने दोनों को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और कहा कि तुुुम पापी हो और पृथ्वी पर जाकर इस पाप का प्रायष्चित करो। तब से लेकर आज तक हर यहूदी मौलिक पाप से पीड़ित है।
अंततः बैबीलोनिया के अब्राहम को ‘‘यहावा’’ अर्थात् ईष्वर ने पवित्रमप्राणी करार दिया। इसी अब्राहम को यहूदी, ईसाई, और इस्लाम को मानने वाले श्रद्व्य मानते हैं। जिस तरह सेनाई पर्वत पर ‘‘मूसा’’ को ईष्वरीय संदेश मिले थे। ई0 पू0(4026में) उसी तरह हजरत मुहम्मद को भी ईष्वरीय संदेश मिला मगर यही कोई सत्ताइस सौ साल बाद।
अस्तु इस तरह के ईष्वर (यहोवा, अल्लाह) आदि की कल्पना अपने यहाँ सभी सभ्यता की देन है यहूदत में अब्राहम ईष्वर (यहोवा ) के कृपा पात्र हैं। ईसाइयत में ईसा ईष्वर की संतान है और इस्लाम में हजरत मुहम्मद ईष्वर के संदेश वाहक ‘‘पैगम्बर’’। सामी या सेमाई आस्था की इन तीनो धाराओं में ईष्वर, लगता कुछ ऐसा है कि वह व्यक्तिवाचक संज्ञा है, जहां उसे छोड़कर किसी और तरफ दृष्टि डालने की आज्ञा नहीं।
यहूदियों का पहला प्रमुख ग्रंथ है ‘‘तोरा’’ जिसका अर्थ होता है षिक्षा, यह सीधे-सीधे ‘‘मौजिज’’ पर नाखिल हुई। यहूदियों के दूसरे ग्रन्थ का नाम है ‘‘तालमुद’’ इसमें मौखिक आचार और दैनिक व्यवहार की बातें हैं। तीसरा ग्रन्थ ‘‘हलाका’’ है। ‘‘तलाका’’ ‘‘तनाका’’ यहूदियों की बाइबल का नाम है। मगर ईसा यहूदत से ठीक उल्टा गये।
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
आभौ दर्पण की अनुक्रमणिका
1-गीता -4
2-‘‘तत्वदर्षन के विशय में स्वामी विवेकानन्द की वाणी’’ -4
3-‘‘हिन्दू’’ -5
4-‘‘यहूदी’’ -6
5-ब्रह्मांड और ईष्वर के विशय में वैज्ञानिक विचार धारा -7
6-क्वांटन काँस्मोलाॅजी -8
7-जीव विज्ञान के विचारक -8
8-एंथ्रांपिक सिद्धान्त -9
9-ईष्वर के वैज्ञानिक भक्त -9
10-सच्चा आध्यात्म -10
11-ऐष्वर्य -10
12-ओषो -11
13-ऊर्जा संतुलित का आहार -11
14-मथुरा वृदावन -12
15-यादों की एक्सरसाइज ऊँ -13
16-और तरीके -13
17-सगुण-निर्गुण चरम पर जब -14
18-आयार्च भगवान रजनीश के वचन-‘‘यात्रा अमृत की, अक्षय, निःसंशयता, निर्वाण और केवल ज्ञान की’’ -14
19-पावन दीक्षा प्रभु से जुड़ जाने की -16
20-षान्ति पाठ का द्वार विराट सत्य और प्रभु का आसरा -17
21-इस पाठ का सारांश -20
22-निर्वाण उपनिशद-अव्याख्य की व्याख्या -21
23-जो जाग्रत हैं, आत्मरत हैं आनन्दमय हैं, परमात्य आश्रित है -22
24-अनन्त धैर्य, अचुनाव जीवन और परात्पर की अभीप्सा -25
25-ब्रह्म दर्षन -25
26-परात्पर की अभीप्सा -26
27-परापवाद मुक्तो जीवन मुक्ति -26
28-अखण्ड जागरण से प्राप्त परमानन्दी तुरीयावस्था -27
29-स्वप्न-सर्जक मन का विसर्जन और नित्य सत्य की उपलब्धि -30
30-साधक के लिए षून्यता, सत्य, योग, अजपा, गायत्री
और विकार-मुक्ति का महत्व -31
31-आनन्द और आलोक की अभीप्सा उन्यनी गति और परमात्म आलम्बन -39
32-अन्तर आकाश में उड़ान स्वतन्त्रता का दायित्व
और शक्तियाँ प्रभु-मिलन की ओर -42
33-अद्वैत सदानन्द ही देव है -45
34-सम्यक त्याग, निर्मल शक्ति और परम अनुषासन मुक्ति में प्रवेश -46
35-बाहरी अनुषासन से हानि भी है -48
36-इससे कैसे मुक्त हों -49
37-असारबोध, अहं विसर्जन और तुरीय तक यात्रा और साक्षीत्व से -50
38-चैतन्यमय होकर संसार त्याग -51
39-त्याग -52
40-भ्रांति-भजन, कामादिवृत्ति दहन, अनाहत मंत्र और अक्रिया में प्रतिष्ठा -53
41-कामादिवृत्ति दहनम् -56
42-अनाहत मंत्र -59
43-निर्वाण रहस्य अर्थात सम्यक सन्यास, ब्रह्म जैसी चर्या और सर्व देहनाश -61
44-निर्वाण की यात्रा प्रारम्भ-‘‘ईषावास्योउपनिशद’’ ‘‘वह पूर्ण है’’ -63
45-‘‘वह परम भोग है’’ ‘‘हरिःऊँ’’ -68
46-वह निमित्त है -71
47-वह अतिक्रमण है -75
48-वह समत्व है -83
49-वह स्वयंभू है -87
50-वह अव्याख्य है -91
51-वह चैतन्य है -94
52-वह ब्रह्म है -101
53-वह ज्योतिर्मय है -107
54-वह षून्य है -114
55-ओ3म् षान्तिः षान्तिः षान्तिः -121
56-असतो मा सद्गमय -124
57-शरीर और आत्मा के कर्म एवं फल का विष्लेशण -130
58-राम कथा समाज का भय हरने वाली अमृतवाणी-
द्वारा मोरारी बापू-चुनार में -131
59-माया अजेय है -132
60-कामाख्या देवी मन्दिर -134
61-बिना ब्रह्म दर्षन के तृप्ति नहीं (कहानी ष्वेत केतु की) -135
62-विचारों में स्थिरता के लिए -136
63-अजमेर-शरीफ अजमेर वही जाते हैं जिन्हें ख्वाजा बुलाते हैं -137
64-अनहद-सुख-दुख और पीड़ा -139
65-बाइबिल -140
66-आत्म बल-आत्म संयम से सर्वोत्तम बल बन जाता है -141
67-अमृतवाणी -141
68-सुख और आनन्द -142
69-‘‘अधिक मास’’ -143
70-श्री विष्णु हरि साधना -143
71-लक्ष्मी का बीज मंत्र -144
72-षिव तत्व आवष्यक है -145
73-भौतिक युग और षिव -146
74-श्रावण मास -147
75-ऊँ नमः षिवाय महा मृत्युंजय साधना -148
76-पाषुपतास्त्रेय साधना -149
77-रसेष्वर साधना -149
78-महाकाल प्रयोग -151
89-षिष्य धर्म -152
80-गुरूवाणी -153
81-आप पूजा क्यों करते हैं -154
82-षिव की शक्ति है महागौरी -157
83-गौरी स्वरूप महालक्ष्मी साधना -157
84-हर गौरी महालक्ष्मी साधना -158
85-साधना विधान -158
86-प्रेम ही ईष्वर है-ज़िन्दगी घड़कन है तेरी -159
87-षिव गौरी -163
88-सरस्वती स्तुति -167
89-यह माया है -168
90-ओ मधुरतम् कृष्ण -169
91-पूर्ण पुरुश कृष्ण-दुर्गा भागवत -169
92-भारतवर्ष की आत्मा है -170
93-प्रवचन-जीवन परमात्मा का प्रसाद है -171
94-जनेऊ का महत्व -172
95-अवतार का महत्व -173
96-गायत्री रामायण -174
97-सद्गुरू ज्योति को मिलाता है -176
98-सत्यस्य सत्यम् -177
99-विज्ञान और धर्म -178
100-प्रेम और प्यार में अन्तर -180
101-राधा बिन कृष्ण अधूरे -181
102-परमानन्द की खोज -182
103-परहेज और सब्र का महीना -183
104-दीपावली में लक्ष्मी -185
105-भगवान बुद्ध -185
106-प्रणाम का महत्व -185
107-’‘बोध कथा’’ -187
108-‘‘श्राद्ध के विशय में’’ -187
109-आठ सिद्धियाँ -189
110-‘‘अनहद’’-राम का तात्पर्य -190
111-अर्जुन को अपनी स्थिति का वर्णन द्वारा कृष्ण ‘‘गीता अध्याय 10’’ -191
112-यात्रा टिप्पणी अल्मोड़ा से बिंसर की -192
113-द्वारा मुरारी बापू -194
114-संगीत -194
115-सौन्दर्य के गुण -198
116-स्पष्ट आध्यात्म-स्वयं से-षंकर -198
117-प्राचीन कालीनषिष्योंकीभक्ति काआदर्ष -198
118-द्वारा श्री बल्लभा जी महाराज -199
119-उपासना की विधियाँ -200
120-सभा -202
121-षामे अवध -233
122-लखनऊ के इमामबाड़े -236
123-लखनऊ के प्राचीन प्रसिद्ध मंदिर -238
124-अवध की कवित्रियों का सौंदर्य वर्णन -239
125-बैकुण्ठ चतुर्दषी व्रत की कथा -250
126-षाकाहार भोजन का तिरंगा झंडा से समानता -251
127-नवें गुरू तेगबहादुर सिंह -251
128-बारह देवियों का पूजन किस माह में करें -251
129-कुण्डलिनी -252
130-चैतन्य होने के लिए -253
131-डल् प्छक्प्। -253
132-श्री गणेषाय नमः -254
133-आदर्ष वाक्य -254
134-महाभारत से -260
135-परमपूज्य गुरू आसाराम जी महाराज-द्वारा अमृत वचन -261
136-षुभ संदेश -262
137-स्वअम. -262
138-जीवन का सद्उपयोग -262
139-स्वतन्त्रता-दिवस (15 अगस्त 1947 ई0 पर) -263
140-ज्योतिषि -264
141-देश को एकता के सूत्र में बाँधती हैं 51 शक्ति पीठें -265
142-शक्ति-साधना-डा0 जीवन षुक्ल -269
143-भक्ति का धर्म-द्वारा षंकर संकलनकर्ता एवं रचयिता -270
144-सदा दिवाली-गुरूवर संत श्री आषारामजी महाराज -275
145-तपती रही सलाख में से-द्वारा कविवर श्री कोमल षास्त्री -281
146-वन फूल-द्वारा पं0 रूप नारायण त्रिपाठी मुक्तक (माटी की मुस्कान से) -290
147-कानन कुसुम-द्वारा जयषंकर प्रसाद -303
148-खण्डित पूजा-द्वारा मधुरिमा सिंह -310
149-’’वीर प्रकरण’’-द्वारा कविवर वीर सेन सिंह -320
150-राधा के सगुण-ऊधो के निर्गुण-द्वारा विन्दु जी -328
151-अन्य -330
152-सबरसरंग से -336
153-गीत की खेती से -388
154-खण्ड काव्य-नमन् इन्दिरा से -408
155-माया प्रबल है -416
156-बेहद खास है आज का दिन, 100 साल बाद मिलेंगे 9,9 और 9 -416
